बांसवाड़ा। राजस्थान के सुदूर वागड़ अंचल अंतर्गत आने वाले बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिले में श्रावण मास को लेकर एक अत्यंत विशिष्ट एवं सांस्कृतिक परंपरा देखने को मिलती है। सामान्यतः देश के अधिकांश राज्यों में आषाढ़ पूर्णिमा के अगले दिन से ही सावन महीने की शुरुआत मानी जाती है और शिवालयों में जलाभिषेक आरंभ हो जाता है। इसके विपरीत वागड़ क्षेत्र की अनूठी लोक मान्यताओं के कारण यहां सावन पर्व का उल्लास पूरे डेढ़ महीने तक बना रहता है। स्थानीय समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने के साथ-साथ राष्ट्रीय परंपराओं का भी सम्मान करते हुए लंबे समय तक शिव भक्ति के माहौल में रमा रहता है।
स्थानीय और राष्ट्रीय परंपराओं के सुंदर मेल से डेढ़ माह तक चलता है अनुष्ठान
क्षेत्र के श्रद्धालु पारंपरिक रूप से हरियाली अमावस्या से श्रावण मास की आधिकारिक शुरुआत मानते हैं, किंतु आधुनिक समय में देश के अन्य हिस्सों की परिपाटी को भी अपनाया जाने लगा है। इस वजह से कई श्रद्धालु आषाढ़ पूर्णिमा के तुरंत बाद से ही व्रत, विशेष पूजा-अर्चना और जलाभिषेक की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं, जबकि मुख्य लोक परंपरा के अनुसार मूल अनुष्ठान हरियाली अमावस्या के पश्चात ही गति पकड़ते हैं। दो अलग-अलग परंपराओं के इस अद्भुत संगम के चलते वागड़ क्षेत्र में शिव आराधना का यह पावन पर्व करीब 45 दिनों की लंबी अवधि तक अनवरत चलता रहता है।
गुजरात सीमा से सटी अमांत गणना के कारण हरियाली अमावस्या से माना जाता है सावन
उत्तर भारत के बहुसंख्यक क्षेत्रों में हिंदी पंचांग के महीनों की गणना पूर्णिमा से पूर्णिमा तक की जाती है, जिसे पूर्णिमांत पद्धति कहा जाता है। दूसरी ओर गुजरात और उससे सटे वागड़ अंचल में महीनों की गणना अमावस्या से अमावस्या तक यानी अमांत पद्धति से होती है। यही वजह है कि जब देश के अन्य राज्यों में श्रावण मास के मध्य में हरियाली अमावस्या का पर्व मनाया जाता है, ठीक उसी दिन वागड़ अंचल में नए सावन महीने की धार्मिक शुरुआत मानी जाती है। इसी कारण से क्षेत्रीय लोक जीवन में धार्मिक आयोजनों की समय-सीमा विस्तृत हो जाती है।
मंदारेश्वर धाम में उज्जैन के महाकाल की तर्ज पर भस्म आरती, उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
वागड़ क्षेत्र में अमांत परंपरा के अनुसार सावन की शुरुआत होने के साथ ही विभिन्न शिवालयों में धार्मिक अनुष्ठान तेज हो गए हैं। श्रावण सोमवार के अवसर पर तड़के से ही मंदिरों में भक्तों की भारी आवाजाही दर्ज की गई। शहर के प्रसिद्ध एवं प्राचीन मंदारेश्वर शिव मंदिर में उज्जैन के प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर की तर्ज पर भव्य भस्म आरती का आयोजन किया गया, जिसमें शामिल होने के लिए सैकड़ों श्रद्धालु पहुंचे। इसके साथ ही क्षेत्र के अन्य सभी छोटे-बड़े मंदिरों में भी दिनभर जलाभिषेक और रुद्राभिषेक का दौर चलता रहा।


