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    साउथ में क्यों नहीं निकलती कांवड़ यात्रा? क्या होता है कावड़ी अट्टम, जिसमें होती है भगवान मुरुगन का जलाभिषेक

    सावन के महीने में उत्तर भारत की सड़कों पर ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के जयकारे गूंजने लगते हैं. लाखों श्रद्धालु कंधे पर कांवड़ लिए हरिद्वार, गंगोत्री या बाबा बैद्यनाथ धाम की ओर पैदल निकल पड़ते हैं. इस दौरान पूरे उत्तर भारत में एक अलग और खास तरह का माहौल रहता है. लेकिन दक्षिण भारत (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना) में यहां जैसा महौल देखने को नहीं मिला. न बोल बम के नारे और नहीं कांवड़िए और कांवड़ यात्रा. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या साउथ में कांवड़ यात्रा नहीं होती? और क्या वहां सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा नहीं की जाती? हम आपको इसके पीछे की वजह कल्चरल, जियोग्राफीकल और पंचांग के आधार पर बताने जा रहे हैं.
    कैलेंडर का अंतर: अमंत और पूर्णिमंत पंचांग

    उत्तर और दक्षिण भारत में शिव पूजा के समय में सबसे बड़ा अंतर पंचांग की गणना की वजह से आता है.

        उत्तर भारत में पूर्णिमंत पंचांग: उत्तर भारत में पूर्णिमंत पंचांग का पालन होता है, जहां महीना पूर्णिमा के बाद शुरू होता है. इसलिए उत्तर भारत में सावन का महीना जुलाई-अगस्त के आसपास पड़ता है.
        दक्षिण भारत में अमंत पंचांगः दक्षिण भारत और महाराष्ट्र/गुजरात में अमंत पंचांग चलता है, जहां नया महीना अमावस्या के बाद शुरू होता है. इस वजह से दक्षिण भारत में ‘श्रावण मास’ उत्तर भारत के सावन से लगभग 15 दिन बाद शुरू होता है.

    जब उत्तर भारत में सावन की कांवड़ यात्रा अपने चरम पर होती है, तब दक्षिण भारत में आषाढ़ या सावन की शुरुआत का समय अलग चक्र में चल रहा होता है.

    कांवड़’ के बजाय ‘कावड़ी अट्टम’ की परंपरा

    दक्षिण भारत में उत्तर भारत जैसी गंगाजल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाने की कांवड़ यात्रा भले न हो, लेकिन वहां कांवड़ का स्वरूप अलग रूप में मौजूद है. दक्षिण भारत में कावड़ी यात्रा मुख्य रूप से भगवान शिव के बेटे भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) को समर्पित होती है. इसे ‘कावड़ी अट्टम’ कहा जाता है.
    कांवड़ यात्रा से अलग है कावड़ी अट्टम
    कावड़ी अट्टम में श्रद्धालु लकड़ी या बांस की बनी कांवड़ियों को अलग-अलग तरह से सजाते हैं और अपने कंधों पर उठाकर थिरकते हुए मंदिरों तक जाते हैं. मान्यता है कि असुर इडुंबन ने महर्षि अगस्त्य के आदेश पर दो पर्वतों को कांवड़ की तरह उठाकर ले जाने की शुरुआत की थी, तभी से दक्षिण में यह परंपरा प्रचलित हुई. हालांकि, कावड़ी अट्टम जनवरी-फरवरी में मनाया जाता है.
    भौगोलिक और सांस्कृतिक आधार पर मान्याताएं
    उत्तर भारत में कांवड़ यात्रा का सीधा संबंध गंगा नदी और हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे पवित्र तटों से है. उत्तर भारत में गंगाजल लाकर स्थानीय शिव मंदिरों में जलाभिषेक करने पुरानी परंपरा रही है. जबकि दक्षिण भारत में गोदावरी, कावेरी, कृष्णा और तुंगभद्रा जैसी नदियां बहती हैं. वहां श्रद्धालु स्थानीय पवित्र नदियों से जल लेकर सीधे रामेश्वरम, मल्लिकाार्जुन (शैलम) या चिदंबरम जैसे प्रमुख ज्योतिर्लिंगों और शिव मंदिरों में अभिषेक करते हैं, लेकिन उत्तर भारत जैसी होनें वाली कांवड़ियों की पैदल यात्रा की तरह नहीं होती.
    दक्षिण भारत में कांवड़ यात्रा का रूप भले ही अलग हो, लेकिन शिव के प्रति भक्ति में रत्ती भर भी कमी नहीं है. उत्तर भारत जहां सावन में गंगाजल की कांवड़ लेकर शिव की शरण में जाता है, वहीं दक्षिण भारत अपने अमंत पंचांग, कार्तिक दीपम और भगवान मुरुगन की कावड़ी यात्रा के माध्यम से उसी शैव परंपरा को जीवंत रखता है.

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