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    कठूमर की मिठास बनी पहचान, तीज के सिंजारे पर मशहूर ‘पपड़ी घेवर’ की बढ़ी मांग

    सिंजारे पर बाजारों में उमड़ी भीड़, बारिश के मौसम में दोगुना लजीज लगता है कठूमर का बबर घेवर

    अशोक जैन, मिशन सच , कठूमर।  हरियाली तीज के पावन अवसर पर कठूमर कस्बे में सिंजारे की धूम है। इसी के साथ कस्बे की खास पहचान बन चुके प्रसिद्ध ‘पपड़ी घेवर’ यानी स्थानीय भाषा में कहे जाने वाले ‘बबर घेवर’ की खुशबू से बाजार गुलजार हो उठे हैं। तीज के सिंजारे पर इन खास घेवर की मांग पूरे क्षेत्र में सबसे अधिक रहती है।

    कठूमर का पपड़ी घेवर अपनी कुरकुरी बनावट, मिठास और खास स्वाद के लिए अलग पहचान रखता है। स्थानीय लोगों के अनुसार राजस्थान में कठूमर का यह पारंपरिक घेवर विशेष रूप से प्रसिद्ध है। तीज के अवसर पर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी लोग इसे खरीदने के लिए कस्बे के बाजारों में पहुंचते हैं।

    स्थानीय लोगों के अनुसार तीज के मौके पर दोपहर बाद से रात करीब 10 बजे तक लगातार पपड़ी घेवर तैयार किए जाते हैं। बारिश के मौसम में गर्मागर्म पपड़ी घेवर खाने का स्वाद और भी बढ़ जाता है। रिमझिम बारिश और ताजा बने कुरकुरे घेवर का मेल तीज के त्योहार को खास बना देता है।

    कठूमर के बाजारों में सुबह से ही ग्राहकों की आवाजाही शुरू हो गई। दोपहर बाद जैसे-जैसे सिंजारे का समय नजदीक आया, घेवर की दुकानों पर भीड़ बढ़ती गई। दुकानदार लगातार घेवर तैयार करने और ग्राहकों की मांग पूरी करने में जुटे नजर आए।

    हरियाली तीज के सिंजारे में पपड़ी घेवर का विशेष महत्व है। कस्बे के साथ आसपास के ग्रामीण अंचलों में भी लोग अपनी बेटियों, बहुओं और बहनों के लिए सिंजारा भेजते हैं। इस पारंपरिक उपहार में पपड़ी घेवर को प्रमुख स्थान दिया जाता है।

    स्थानीय लोगों का कहना है कि तीज के सिंजारे में कठूमर का पपड़ी घेवर न हो तो त्योहार की मिठास अधूरी सी लगती है। यही वजह है कि इस खास मिठाई की मांग तीज के दौरान कई गुना बढ़ जाती है।

    कठूमर के प्रसिद्ध पपड़ी घेवर का स्वाद लेने और सिंजारे के लिए खरीदारी करने के लिए दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों से भी लोग कस्बे में पहुंच रहे हैं। बाजार में जगह-जगह घेवर की दुकानें सजी हुई हैं और हलवाई गर्मागर्म घेवर तैयार करते दिखाई दे रहे हैं।

    कठूमर का यह पारंपरिक पपड़ी घेवर केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि तीज-सिंजारे की वर्षों पुरानी स्थानीय परंपरा और कस्बे की विशिष्ट पहचान का हिस्सा बन चुका है।

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