काबुल। तालिबान द्वारा अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्जा किए जाने के पांच वर्ष पूरे हो चुके हैं। बीते पांच सालों में देश का सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। यद्यपि तालिबान ने प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत करने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था में कुछ सुधार दर्ज किए हैं, लेकिन इसके समानांतर महिलाओं के अधिकारों पर अत्यधिक पाबंदियां, प्रेस की स्वतंत्रता में कमी और सार्वजनिक शारीरिक सजाओं का प्रचलन तेजी से बढ़ा है। 'ह्यूमन राइट्स' की रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2021 से नवंबर 2022 के बीच अदालतों द्वारा कम से कम 18 मामलों में कोड़े मारने जैसी शारीरिक सजाओं के आदेश दिए गए, जो मुख्यतः 'नैतिक अपराधों' से संबंधित थे।
पांच साल पहले का वादा और वर्तमान धरातल
15 अगस्त 2021 को काबुल के पतन के बाद तालिबान ने पूर्ववर्ती सरकार के कर्मचारियों के लिए आम माफी और महिलाओं के बुनियादी अधिकारों के संरक्षण का आश्वासन दिया था। हालांकि, बीते पांच वर्षों के घटनाक्रम इन दावों के विपरीत रहे हैं:
शिक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध: अफगानिस्तान वर्तमान में विश्व का एकमात्र ऐसा देश है जहां लड़कियों के माध्यमिक (सेकेंडरी) स्कूलों और विश्वविद्यालयों में औपचारिक अध्ययन पर पूर्ण रोक लागू है।
रोजगार एवं आवाजाही पर अंकुश: संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के संदर्भ में 100 से अधिक फरमान जारी किए जा चुके हैं। वर्तमान में केवल 7% महिलाएं रोजगार में सक्रिय हैं, जबकि पुरुषों का यह आंकड़ा 84% है।
मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव: सर्वेक्षणों में शामिल लगभग 70% महिलाओं ने अपने मानसिक स्वास्थ्य को अत्यंत चिंताजनक बताया है, वहीं अधिकांश महिलाओं ने बिना पुरुष अभिभावक के बाहर निकलने में असुरक्षा व्यक्त की है।
पत्रकारिता पर संकट और आर्थिक चुनौतियां
'कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स' (CPJ) ने अफगानिस्तान को पत्रकारों के लिए दुनिया के सबसे जोखिम भरे देशों की सूची में रखा है। 2021 के बाद बड़ी संख्या में स्थानीय पत्रकारों को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है।
दूसरी ओर, आर्थिक मोर्चे पर 'वर्ल्ड बैंक' के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में अफगानिस्तान की वास्तविक जीडीपी में 4.8% की वृद्धि दर्ज की गई और सरकारी राजस्व जीडीपी का 19.8% तक पहुंचा। हालांकि, इस आर्थिक सुधार का लाभ आम नागरिकों तक नहीं पहुंच पाया है। प्रति व्यक्ति आय में गिरावट, बढ़ती महंगाई, बिजली की किल्लत, सीमित बैंकिंग व्यवस्था और विदेशी सहायता में आई कमी के कारण देश की आम जनता के सामने जीवन यापन की गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं।


