यरूशलम। इजराइल में 27 अक्टूबर को होने वाले आम चुनावों से पहले देश की राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। हाल ही में सामने आए एक ओपिनियन पोल के नतीजों से संकेत मिलते हैं कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए सत्ता में वापसी की राह कठिन हो सकती है। सर्वेक्षण के मुताबिक, पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाली विपक्षी पार्टी 'यशार' सबसे प्रमुख दल के रूप में उभरती दिख रही है।
सर्वेक्षण के नए आंकड़े और लिकुड पार्टी की चुनौती
ताजा सर्वेक्षण के अनुसार, विपक्षी दल 'यशार' 25 सीटें जीतकर संसद में सबसे बड़े दल का स्थान हासिल कर सकता है। दूसरी ओर, वर्तमान में सत्ता संभाल रही बेंजामिन नेतन्याहू की 'लिकुड पार्टी' 21 सीटों पर सिमटने का अनुमान है। पिछले कुछ सप्ताह के सर्वे में दोनों पार्टियों के बीच कड़ा मुकाबला देखा गया था, लेकिन नए आंकड़ों में 'यशार' ने 4 सीटों की बढ़त बना ली है।
संसदीय गणित और बहुमत का संकट
इजराइली संसद (नेसेट) में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए न्यूनतम 61 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है। आंकड़ों के अनुसार:
नेतन्याहू विरोधी 'चेंज ब्लॉक' को 58 सीटें मिलने का अनुमान है, जो बहुमत के आंकड़े से 3 सीट कम है।
नेतन्याहू समर्थक गुट के खाते में 50 सीटें जाने की संभावना जताई गई है।
अरब राजनीतिक दलों को 12 सीटें मिलने का अनुमान है।
सर्वे में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद 'यशार' के लिए भी बिना अन्य क्षेत्रीय दलों के सहयोग के स्थिर सरकार का गठन करना एक जटिल चुनौती रहेगा।
विपक्षी खेमे में पीएम पद पर मंथन
गादी आइजेनकोट की बढ़ती लोकप्रियता के बीच विपक्षी मोर्चे में प्रधानमंत्री पद के चेहरे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट की अगुवाई वाली 'बीयाचद' पार्टी के वरिष्ठ नेता याइर लैपिड ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी नई सरकार के गठन में रुकावट नहीं बनेगी, हालांकि उन्होंने आइजेनकोट की दावेदारी पर सीधा बयान देने से परहेज किया। वहीं, आइजेनकोट का मानना है कि विपक्षी गठबंधन में सबसे अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी के नेता को ही सरकार की कमान मिलनी चाहिए।
इजराइल में चुनावी प्रणाली और सरकार गठन
इजराइल की निर्वाचन व्यवस्था के तहत जनता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करती। संपूर्ण देश को एक ही निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है, जहां नागरिक अपनी पसंद की राजनीतिक सूचियों (दलों) को वोट देते हैं। प्राप्त मतों के अनुपात के आधार पर संसद की 120 सीटें विभाजित की जाती हैं। इसके बाद राजनीतिक दल आपस में गठबंधन बनाकर 61 सांसदों का समर्थन जुटाने का प्रयास करते हैं।


