मेरी भाषण कला व वाक पटुता लोगों को चुभती थी, इसलिए राजनीति में आगे नहीं आने दिया : महेन्द्र शास्त्री
पिछले काफी दिनों से शास्त्री जी अस्वस्थ्य चल रहे थे मिशन सच के वरिष्ठ पत्रकार प्रेम पाठक ने उनसे जून माह में बात की। पेश है वह बातचीत। पूरा इंटरव्यू अखबार में पढ़ने के लिए क्लिक करें, पेज 8 पर इंटरव्यू – https://missionsach.com/epapers/mission-sach-ground-report-monday-15-june-2026
— कुंभाराम आर्य ने पहचानी राजनीतिक प्रतिभा, पीए से सहकारिता राजनीति में पहुंचे शिखर तक
मिशन सच ग्राउंड रिपोर्ट’ के लिए 15 जून को लिया गया इंटरव्यू मीडिया में महेंद्र शास्त्री का आखिरी इंटरव्यू था, 94 की उम्र में भी याददाश्त और बेबाकी कायम थी। 27 अगस्त को 94 वर्ष की उम्र में महेंद्र शास्त्री के निधन की खबर मिली तो सबसे पहले 15 जून की वह मुलाकात आंखों के सामने आ गई। तब शायद मुझे भी अंदाजा नहीं था कि शास्त्री जी से हुई वह बातचीत उनके जीवन का मीडिया में आखिरी इंटरव्यू होगी और मेरे लिए उनकी अंतिम यादों में हमेशा दर्ज रहेगी।
महेंद्र शास्त्री को मैं करीब ढाई दशक से जानता हूं। जब वे राजनीति में सक्रिय थे, तब से उन्हें करीब से देखने और सुनने का अवसर मिला। उनके जैसा प्रखर और प्रभावशाली वक्ता मैंने अपने पत्रकारिता जीवन में नहीं देखा। जब शास्त्री जी बोलते थे तो माहौल अपने आप शांत हो जाता था। लोग उन्हें एकचित होकर सुनते थे। उनकी बातों में ओज था, तर्क था और अपनी बात कहने का अद्भुत साहस था। उनकी भाषा में मिठास के साथ सवाल उठाने की ताकत थी और यही उनकी पहचान थी।
प्रेम पाठक अलवर. अलवर की राजनीति में महेन्द्र शास्त्री का नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता कुंभाराम आर्य के पीए से राजनीति का सफर शुरू कर एक बार विधानसभा की दहलीज तक पहुंचे और अलवर में कांग्रेस की सहकारिता की राजनीति में शिखर तक पहुंचे। वयोवृदध नेता महेन्द्र शास्त्री 94 साल की आयु पार करने के बाद भी आज अलवर ही नहीं प्रदेश व देश की राजनीति की पूरी रूचि रखते हैं। हालांकि जीवन के शुरुआती दौर में अनेक पारिवारिक परेशानियों का सामना करने के कारण उनकी रूचि राजनीति में नहीं रही, लेकिन प्रदेश के वरिष्ठ नेता रहे कुंभाराम आर्य महेन्द्र शास्त्री की राजनीति सूझबूझ से प्रभावित हुए और उन्हें अपने साथ ले जाकर पीए बना दिया और यहां से उनका राजनीति सफर शुरू हुआ। महेन्द्र शास्त्री चुनावी राजनीति में ज्यादा सफल नहीं रह सके, लेकिन सहकारिता की राजनीति में अपनी अमिट छाप छोड़ी और अलवर में कांग्रेस की सहकारिता राजनीति के चाणक्य कहलाए। वृदधावस्था के चलते महेन्द्र शास्त्री अब राजनीति में सक्रिय नहीं हैं, लेकिन अलवर की राजनीति में उनकी बेबाकी राजनीतिक टिप्पणी व आकर्षक भाषण कला लोगों को उनके राजनीतिक जीवन की याद ताजा कर जाती हैं। प्रस्तुत है वयोवृदध नेता महेन्द्र शास्त्री के राजनीतिक सफर, अलवर, प्रदेश व देश की राजनीति, संघर्षमयी जीवन एवं अन्य मुददों को लेकर मिशन सच की ओर से की गई बातचीत की रिपोर्ट।

गांव में घर नहीं, जंगल में खेत नहीं
वयोवृदध कांग्रेस नेता महेन्द्र शास्त्री का कहना है कि मेरा जितना भी राजनीतिक जीवन है, वह व्यक्तिगत और अकेला है। कारण है कि उनका गांव में घर नहीं था और जंगल में खेत। वे बताते हैं कि उनके जीवन का शुरुआती दौर बड़ी कठिनाई भरा रहा, 12 साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो जाने से वे अकेले रह गए, लेकिन दोस्तों व मित्रों के सहारे से जीवन चला। बाद में गांव में अपनी पांच बीघा जमीन बेचकर वे मौसी के यहां मध्यप्रदेश चले गए। बाद में वे वापस अलवर अपने गांव आ गए। इसी तरह जीवन का शुरुआती दौर कठिनाइयों में बीता।
भजनोपदेशक बनाना चाहते थे
महेन्द्र शास्त्री बताते हैं कि उनकी शुरू में राजनीति में कोई रूचि नहीं रही। उन्हें भजनोपदेशक बनाने के लिए राजनीति में डाला, लेकिन वे भजनोपदेशक नहीं बन पाए। भजनोपदेशक बनाने के लिए अलवर छोड़कर राजस्थान में भजनोपदेशक पृथ्वीसिंह के पास चला गया। कुछ समय उनके पास रहा, लेकिन बाद में अपने गांव वापस आ गया। गांव आकर खेती बाड़ी और घर का काम किया।
चपरासी से लेकर शिक्षक का निभाया दायित्व
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता महेन्द्र शास्त्री ने किसी तरह 10 वीं कक्षा पास की। बाद में उन्होंने चपरासी की नौकरी ज्वाइन की। चपरासी के बाद वे शिक्षक बन गए और प्राइमरी स्कूल से गुरुकुल में चला गया, बाद में तीन— चार और स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने का कार्य किया। इस तरह जीवन के शुरुआती दौर की कठिनाइयों का सामना किया। बाद में महेन्द्र शास्त्री ने एलएलबी की पढ़ाई और वकालात की।
कुंभाराम आर्य के पास जाने से बदला जीवन
महेन्द्र शास्त्री ने बताया कि शिक्षक की नौकरी के बाद वे कुंभाराम आर्य के पास चले गए। उन दिनों कुंभाराम आर्य राजस्थान में कांग्रेस के बड़े नेता होते थे और प्रदेश की राजनीति में पूरी दखल रखते थे, इतना नहीं वे जाति बिरादरी को संरक्षण देते थे। लेकिन वहां भी मन नहीं लगने के बाद वापस अलवर आ गया और िफर से अपनी मौसी के पास मध्यप्रदेश चला गया। वे बताते हैं कि कुंभाराम आर्य को उनमें क्या दिखा कि वे मुझे मध्यप्रदेश में मौसी के पास से अपने यहां ले आए और पीए बना दिया। उसके बाद अलवर आकर 1962 में विधानसभा का निर्दलीय चुनाव लड़ा, लेकिन हार गया। उसके बाद वे सहकारिता की राजनीति में चले गए।
कुंभाराम आर्य ने अलवर के नेताओं से कहा, एडजस्ट करो
सन 1962 का चुनाव हारने के बाद वरिष्ठ नेता कुंभाराम आर्य ने अलवर के कांग्रेसी नेताओं से उन्हें एडजस्ट करने को कहा। तत्कालीन वरिष्ठ नेता घासीराम यादव भी चाहते थे कि मैं कहीं एडजस्ट हो जांउ। बाद में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता शोभाराम ने उन्हें सहकारिता की राजनीति में मोड दिया। इसके बाद वे सहकारिता में डायरेक्टर बने। सहकारिता की राजनीति में शास्त्री शिखर तक पहुंचे और उन्हें 2010 में सहकारिता रत्न अवार्ड से नवाजा गया। वे को— आपरेटिव बैंक के अध्यक्ष, अलवर कृषि उपज मंडी का अध्यक्ष, राजस्थान राज सहकारी संघ, राजस्थान राज्य उपभोक्ता सहकारी संघ, राजस्थान राज्य औद्योगिक सहकारी बैंक, राजस्थान सहकारी मुद्रणालय एवं राजस्थान राज्य सहकारी को— आपरेटिव बैंक में संचालक मंडल के सदस्य रहे।
लोकदल से मिला विधानसभा पहुंचने का मौका
वरिष्ठ नेता महेन्द्र शास्त्री को चुनावी राजनीति ज्यादा रास नहीं आई, 1962 में पहली बार विधानसभा चुनाव में मुंडावर से निर्दलीय लड़ने पर हार झेलनी पड़ी। इसके बाद 1980 में लोकदल से चुनाव लड़ा और हारा, लेकिन 1985 में हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें मुंडावर से लोकदल से चुनाव लड़ने का मौका मिला और वे जीते भी। इसके बाद वे 1990 का विधानसभा चुनाव िफर लोकदल से लड़े, लेकिन हार मिली। इसके बाद वे कांग्रेस में लौटे और 2003 का विधानसभा चुनाव मुंडावर से कांग्रेस टिकट पर लड़ा। हालांकि वे यह चुनाव मुंडावर से नहीं लड़ना चाहते थे, उनका मन लक्ष्मणगढ़ से चुनाव लड़ने का था, लेकिन कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी के आदेश पर उन्हें यह चुनाव लड़ना पड़ा। इस चुनाव में भी उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा।
अब राजनीति तमाशा हो गई
महेन्द्र शास्त्री बताते हैं कि अब राजनीति तमाशा बनकर रह गई है, जिसकी जहां चाह बने, वहीं चला जाता है। राजनीति अब खत्म हो चुकी है, अब राजनीति में लोग सब कुछ हजम कर जाते हैं। उन्होंने बताया कि राजनीति में अब बदलाव के अलावा कुछ नहीं दिखता, अब राजनीति में न कोई रीति— नीति और विज्ञान नहीं बचा। अब कोई पार्टी नहीं रही, सब मौके की पार्टी रह गई हैं, बस चल रही हैं।
मैं किसी एक धर्म के साथ नहीं चला
वयोवृदध नेता शास्त्री बताते हैं कि राजनीति में मैं कभी किसी एक धर्म के साथ नहीं चला। मेरे लिए सभी धर्म समान होते थे। उन्होंने माना कि आकर्षण भाषण कला, सुंदरता व राजनीतिक चहल— पहल उस दौर में लोगों को चुभती थी। मैंने कांग्रेस की राजनीति में आगे आने की कोशिश की, लेकिन लोगों ने उन्हें आगे नहीं आने दिया।
मोदी प्रधानमंत्री नहीं, जातिवादी नेता
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता महेन्द्र शास्त्री ने कहा कि वे नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री नहीं मानते, में उन्हें एक जातिवादी नेता मानता हूं। उन्होंने कहा कि यह प्रजातंत्र के लिए ठीक नहीं है। अब देश में हिंदू— मुस्लिम हो रहा है, जनता के वास्तविक मुददे गायब हो गए।
सुखाड़िया, गहलोत व शेखावत प्रभावशाली नेता
कांग्रेसी नेता शास्त्री पूर्व मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया, अशोक गहलोत व भाजपा में भैंरोसिंह शेखावत को प्रदेश की राजनीति में प्रभावशाली नेता मानते हैं। वहीं अलवर जिले में मा. भोलाराम व शोभाराम को प्रभावशाली नेता मानते हैं। अब कभी अशोक गहलोत तो कभी सचिन पायलट चलता रहता है। उन्होंने कहा कि संगठन के लिए अशोक गहलोत ठीक है। वहीं भाजपा में शेखावत व पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे में भैंरोसिंह शेखावत को अच्छा बताते हैं।
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