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    सदियों तक रहेगा…अंबाला में बनाया जा रहा ऐसा मंदिर, लोहे-सरिये का इस्तेमाल नहीं

    आपने बड़े-बड़े मंदिरों और भवनों का निर्माण होते तो जरूर देखा होगा, लेकिन क्या आपने कभी ऐसा मंदिर देखा है, जिसके निर्माण में न तो लोहे का इस्तेमाल हो रहा हो और न ही सरिये का. अंबाला में करीब ढाई एकड़ क्षेत्र में ऐसा ही एक अनूठा जैन मंदिर आकार ले रहा है. इंद्रदिन सूरी समाधि मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्राचीन निर्माण तकनीक है. वर्ष 2011 से निर्माणाधीन यह मंदिर आधुनिक लिंटर, लोहे और सरिये के बिना तैयार किया जा रहा है. पूरा ढांचा राजस्थान के मकराना से लाए गए संगमरमर पत्थरों और प्राचीन भारतीय डाट तकनीक से बनाया जा रहा है. मंदिर का निर्माण जैन मुनि विजय रत्नाकर सूरीश्वर के मार्गदर्शन और उनके तैयार पारंपरिक प्रारूप के अनुसार शुरू हुआ था. अब आचार्य श्रीमद् विजय धर्मधुरंधर सूरीश्वर जी महाराज की देखरेख में इसका निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है. मंदिर की परिकल्पना प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की कुबेर द्वारा निर्मित विनीता नगरी की तर्ज पर की गई है.

    लग रहा ज्यादा समय
    इस मंदिर की निर्माण प्रक्रिया इसे दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग बनाती है, क्योंकि आधुनिक निर्माण में जहां लोहे और सरिये का इस्तेमाल ढांचे को मजबूती देने के लिए किया जाता है. यहां पत्थरों को विशेष तकनीक से एक-दूसरे के साथ जोड़कर संरचना तैयार की जा रही है. यही वजह है कि मंदिर के निर्माण में समय भी अधिक लग रहा है, लेकिन इसका उद्देश्य ऐसा धार्मिक स्थल तैयार करना है, जो लंबे समय तक भारतीय वास्तुकला और शिल्पकला की मिसाल बना रहे.

    केवल पूजा स्थल नहीं
    मंदिर कमेटी के सदस्य अतुल जैन लोकल 18 से बताते हैं कि मंदिर का निर्माण प्राचीन भारतीय निर्माण पद्धति से किया जा रहा हैं. इसमें आधुनिक लिंटर, लोहा और सरिया नहीं लगाया जा रहा, बल्कि मकराना के संगमरमर से पत्थरों को डाट तकनीक के जरिए जोड़कर मंदिर का स्वरूप तैयार किया जा रहा है. मंदिर को केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए धार्मिक और वास्तुकला की धरोहर के रूप में विकसित किया जा रहा है. मंदिर की वास्तुकला भी अपने आप में खास होगी क्योंकि मुख्य जिनालय करीब 500 गज क्षेत्र में बनाया जा रहा है. पूरे परिसर में कुल 36 गुंबद तैयार किए जाएंगे. इन गुंबदों के नीचे जैन परंपरा के 108 आचार्य भगवंतों के स्वरूप स्थापित किए जाएंगे. मंदिर की बाहरी दीवारों पर करीब 6-6 इंच गहरी पत्थर की नक्काशी की जा रही है. श्रद्धालुओं को यहां सिर्फ संगमरमर की भव्य इमारत ही नहीं, बल्कि पत्थरों पर उकेरी गई बारीक शिल्पकला भी देखने को मिलेगी. मंदिर परिसर में आश्रम, भोजनशाला और श्रद्धालुओं से जुड़ी अन्य सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी. यहां जैन धर्म के प्रमुख तीर्थों और धार्मिक प्रसंगों की गाथाओं को पत्थरों पर उकेरा जाएगा.
    और क्या-क्या होगा
    शंखेश्वर तीर्थ से जुड़े प्रसंग में श्रीकृष्ण, बलराम, भगवान नेमिनाथ और धरणेंद्र-पद्मावती की कथा दिखाई जाएगी. जीरावलातीर्थ में आचार्य और सेठ को आए स्वप्न तथा पहाड़ से प्रतिमा मिलने की कथा को शिल्प के रूप में दर्शाया जाएगा. स्तंभनतीर्थ में नीलमणि की प्रतिमा, नागकुमारों की भक्ति और समुद्र से प्रतिमा के प्रकट होने की घटना दिखाई जाएगी. नवखंडा पार्श्वनाथ की कथा में प्रतिमा के नौ टुकड़े होने और फिर सुरक्षित रूप से जुड़ने का प्रसंग शिल्प में नजर आएगा. सम्मेदशिखर में भगवान पार्श्वनाथ के निर्वाण और आचार्यों के आकाश मार्ग से आने का चित्रण किया जाएगा. अंतरिक्ष तीर्थ से जुड़ा प्रसंग भी मंदिर के शिल्प में दिखाई देगा, जिसमें रावण के आदेश पर रेत से बनी प्रतिमा और उसके वज्रमय होने की कथा को उकेरा जाएगा. मंदिर के बाहरी हिस्से को राजा-महारानी की शोभायात्रा से सजाया जाएगा, जबकि पिछली दीवार पर कलिकुंड पार्श्वनाथ का विशेष शिल्प तैयार किया जाएगा.

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