लेखन में देशप्रेम को सर्वोपरि मानते हैं डॉ. शर्मा, बोले—संवेदनशीलता और राष्ट्रप्रेम ने ही मुझे कलमकार बनाया
प्रहलाद पुष्पद वरिष्ठ पत्रकार, अलवर। साहित्य और शिक्षा जगत में डॉ. देवेंद्र शर्मा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। एक प्रतिबद्ध शिक्षक और भाषा वैज्ञानिक के रूप में साख अर्जित करने से वे विद्यार्थियों के चहेते रहे। होने को वे स्कूल शिक्षा में प्राध्यापक रहे, लेकिन एमए हिंदी और प्रतियोगी परीक्षा देने वाले छात्र-छात्रा भी नाममात्र का शुल्क देकर उनसे घर पर पढ़ने आते रहे। भौगोलिक दूरी और समय अभाव के कारण पढ़ाई से वंचित विद्यार्थियों की माँग पर उन्होंने मानक हिंदी व्याकरण एवं रचना लिखी।
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डॉ. शर्मा ने शिक्षक होने के साथ-साथ साहित्यिक भूमिका का भी सफल निर्वाह किया है। स्वतंत्र लेखक शर्मा के दो कहानी संग्रह, बीते वे दिन (उपन्यास), काव्य संग्रह – निष्ठुर चितवन, रसगंध, उनको भी एक दीप जलाओ (कविता संग्रह) उन्हें साहित्यकारों की बिरादरी में प्रतिष्ठित करते हैं। उन्होंने जीवन के व्यापक अनुभव और अर्जित ज्ञान-कौशल से पूरी संवेदना के साथ मानव जीवन की विविध भंगिमाओं को सहज ढंग से उजागर किया है।
गहन अनुभूतियों के चितेरे देवेंद्र शर्मा की काव्य रचनाओं में सुगंध, तरंग और सरगम का सुंदर सामंजस्य दिखाई देता है। 50 साल से अलवर शहर में रहते हुए भी वे गाँव को भुला नहीं पाए। उनकी कहानियों और काव्य-रचनाओं में गाँव की धड़कन स्पष्ट सुनाई देती है। शिक्षा के हथियार और कलम की धार से सामाजिक बदलाव लाने में जुटे डॉ. शर्मा ‘मिशन सच’ के साथ संवाद के दौरान बहुत सहज, पर प्रफुल्लित बने रहे।
प्रश्न- लेखन का शौक कब से है? अपने कृतित्व के बारे में बताइए?
उत्तर- यौवन की दहलीज पर पैर रखते ही मेरे अंदर का सृजन-धर्म स्वतःस्फूर्त हुआ। हिंदी भाषा का शिक्षक रहा हूँ। इसलिए गद्य-पद्य की सभी विधाओं, छंद-अलंकारों, काव्य के नवरसों, काव्यदोषों, लेखकों, कवियों और कविता की प्रकृति का जानकार हूँ। लिखते-लिखते अभ्यास से लेखन में निखार आया, पाठकों श्रोताओं का समर्थन मिलता गया। अब तक साहित्यिक और शैक्षणिक महत्व की 15 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। तीन अभी प्रकाशनाधीन हैं।
प्रश्न- बहुआयामी लेखन के बावजूद आप स्वयं को किस विधा में माहिर मानते हैं?
उत्तर- वैसे तो मैं गद्य-पद्य की सभी विधाओं में लिखता रहा हूँ, लेकिन मुझे कविता करना अधिक रुचता
रहा।
प्रश्न- आपके लेखन में महिला जीवन की वेदना को बहुत कम स्थान मिला है। ऐसा क्यों?
उत्तर- मेरे लेखन में महिला ही नहीं, पुरुष-वेदना का स्थान भी गौण ही रहा है। मैंने अपने काव्य में राष्ट्र-प्रेम को सर्वोपरि रखा है। देशभक्ति के समक्ष कुछ भी नहीं टिकता। मुझे अपने देश और उसके गौरव पर अभिमान है।
प्रश्न- तत्सम शब्दों का प्रयोग आपको कठिन काव्य का प्रेत बनाता है। क्या यह शब्द-ज्ञान की यानी कि पांडित्य प्रदर्शन की चेष्टा नहीं है?
उत्तर- प्रसाद, पंत, निराला जैसे कवियों को पढते हुए उसी स्तर का लेखन भी हुआ, जो मुझको स्वाभाविक ही लगता है। कभी महसूस ही नहीं हुआ कि मैं कठिन काव्य का सृजन कर रहा हूँ। यह सब स्वाभाविक ही होता आ रहा है, किसी विशेष प्रयास से नहीं।
प्रश्न- कठिन शब्दावली आपके सृजन की लोकप्रियता में बाधक रही है। आप क्या मानते हैं?
उत्तर- स्कूल कॉलेज के विद्यार्थियों को 30 साल तक हिंदी साहित्य पढ़ाते-पढ़ाते असंख्य कठिन शब्द मेरी जुबान पर चढ़ गए। टीचर्स के लिए हिंदी शिक्षण अधिगम की तकनीक समझाते हुए, उच्च शिक्षित युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते कराते तत्सम शब्दावली का प्रयोग करता रहा। वर्षो के अभ्यास के कारण मुझे लेखन के दौरान शब्दों के कठिन होने का एहसास ही नहीं होता। मुझे वह स्वाभाविक भाषा ही लगती है
प्रश्न- क्या पत्नी श्रीमती पुष्पलता तिवाड़ी साहित्य-सृजन के लिए आपकी प्रेरणा रही हैं? उन्होंने आपको साहित्यकार बनाने में किस तरह मदद की होगी?
उत्तर- वे मेरे हर सृजन की प्रथम पाठक व श्रोता रही हैं। उन्होंने सदैव मुझे लिखने, और बेहतर लिखने के लिए प्रेरित किया है। राजकीय सेवा से निवृत्त होने के बाद मैं साहित्य- साधना में जुटा रहा हूँ। श्रीमती पुष्पलता के भाई (स्वर्गीय राजेंद्र तिवाड़ी) भी वीर रस के मशहूर कवि रहे। इसलिए वे मेरी प्रेरणा और परामर्शक की भूमिका निभाती हैं। अक्सर कवियों की पत्नियाँ अपने पति की कविताओं से तंग और बोर होती रहती हैं। नई कविता सुनाने के लिए कवियों के पास उनकी पत्नी ही सहज उपलब्ध रहती हैं। यह बात और है कि श्रीमती जी ने कभी भी खुद को मजबूर श्रोता होने का अहसास नहीं होने दिया।
प्रश्न- व्यक्तित्व के किन गुणों ने आपको कवि बनने में मदद की?
उत्तर- बचपन से ही भावुक और संवेदनशील तो था ही, राष्ट्रवाद से भी प्रेरित प्रभावित रहा हूँ। संवेदन शीलता और राष्ट्रप्रेम ने ही मुझे कलमकार बनाया।
प्रश्न- आपको सतसई लिखने की क्यों सूझी?
उत्तर- कवि होने के नाते सतसई काव्य-परंपरा को आगे ले जाने में सहयोग करने का इच्छुक था। 35 साल के अध्यापन काल में सतसई रचनाओं से गुजरते हुए सतसई के प्रति प्रेम गहरा होता गया। दोहाकार होने से मेरे पास सैकड़ों दोहों का संग्रह था। जो सात सौ दोहों की पुस्तक में काम आया। दरअसल प्रेम के रूपों की महक सतसई ग्रंथों में मिलती है। मैंने ‘देव सतसई’ में पूर्वज सतसईकारों की चरण-धूलि शिरोधार्य कर अपनी बात कहने का प्रयास किया है।
प्रश्न- ‘प्रवासी परिंदे’ 19 कहानियों का गुलदस्ता है। कथा-संग्रह के बारे में आपकी क्या राय है?
उत्तर- गुलदस्ता तभी सुशोभित होता है जब उसमें गुलों का गुल्म हो। यही मेरे प्रस्तुत कहानी संग्रह में हुआ है।
प्रश्न- मुंशी प्रेमचंद की तरह आपने भी गरीबी ओढ़ी बिछाई है। गाँव व गरीबी के चित्रण में आपने जो नैरेटिव गढ़ा है, उसके बारे में कुछ कहेंगे?
उत्तर- आमतौर पर रचनाकार किसी भी कहानी का प्लॉट तैयार करते समय अपने आसपास से ही, अनुभूत दुनिया में से किरदार चुनता है। मेरा जन्म भी लोहागढ़ के नगर (ब्रज नगर,डीग) गांव में हुआ। मेरी कहानियों के ज्यादातर पात्र भी गाँव के गरीब-गुरबे हैं। जो दैनिक जरूरतों के लिए निर्धनता, अभाव-अभियोगों से जूझते हैं। गाँव की बात, रीत, रहन-सहन, बोली भाषा, लोक संस्कृति इन कहानियों में देखने को मिलती है। कई कहानियां आँचलिक भाषा में लिखी गई हैं। इन कहानियों को पाठकों का खूब समर्थन मिल रहा है।
प्रश्न- एक सुयोग्य अध्यापक के रूप में आपको असंख्य विद्यार्थियों ने आदरपूर्वक अपनाया है। आपको एक साहित्यकार की भूमिका में देखकर विद्यार्थियों को कैसा लगता है?
उत्तर- सभी का तो नहीं लेकिन संवेदनशील शिष्यों में से बहुतों का मानस मेरे पास आता रहा है कि सर! आप हमारे आदर्श हो।
प्रश्न- आप आज के कवि समाज से क्या अपेक्षा रखते हैं?
उत्तर- वे जो कुछ लिखें अपना प्रिय लिखें, लेकिन उसमें देश-प्रेम की भावना, आमजन की कठिनाइयों का चित्रण और भाषा के स्तर का अवश्य ध्यान रखें। राष्ट्रभाषा हिन्दी के स्तर को बनाने का भी दायित्व उनका है।
मिशनसच न्यूज के लेटेस्ट अपडेट पाने के लिए हमारे व्हाट्सप्प ग्रुप को जॉइन करें।
https://chat.whatsapp.com/JX13MOGfl1tJUvBmQFDvB1
अन्य खबरों के लिए देखें मिशनसच नेटवर्क


