सीटें कम हों या ज्यादा, बोर्ड की चाबी नेतृत्व और एकजुटता के हाथ में, क्योंकि पिछली बार बिना चुनाव जीते ही बना था सभापति
मनीष मिश्रा , खैरथल। खैरथल की गलियों में घूमिए तो एक ही आवाज गूंजती है। नाराजगी की, सवालों की, बदलाव की मांग की। टीम ने जब शहर के अलग-अलग मोहल्लों, बाजारों और चौपालों पर पहुंचकर आम लोगों, व्यापारियों और बुद्धिजीवियों से सीधी बातचीत की, तो जो तस्वीर उभरकर सामने आई वह किसी को भी चौंका सकती है। नगर परिषद चुनाव अब सिर्फ वार्ड का पार्षद चुनने भर का मामला नहीं रह गया है- यह खैरथल की पहचान और अस्तित्व की सीधी लड़ाई बन चुका है।
जिले की पहचान पर आंच, जनता में उबाल
बातचीत के दौरान बार-बार एक ही मुद्दा सिर उठाकर सामने आया- खैरथल जिले का नाम और मुख्यालय। तीन साल पहले जिस दिन खैरथल को जिले का दर्जा मिला था, उस दिन पूरे शहर ने राहत की सांस ली थी, नई पहचान का जश्न मनाया था। मगर आज जब उसी पहचान पर बदलाव की तलवार लटकती नजर आ रही है, तो लोगों का गुस्सा धरने-प्रदर्शन की शक्ल ले चुका है।
सवाल सीधा और तीखा है- जब जिला बनाकर खैरथल को सम्मान दिया गया, तो अब उसमें बदलाव की नौबत आई ही क्यों? जनता इसे सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं, अपने बच्चों के भविष्य और आने वाली पीढ़ियों के हक पर सीधा हमला मान रही है। साफ जवाब न मिलने से पैदा हुआ असमंजस अब गहरा गया है, और यही असमंजस इस बार वोट की सियासत तय करने वाला है।
पांच साल का हिसाब मांग रही जनता, बोर्ड कठघरे में
दूसरा मोर्चा है विकास का, और यहां भी जनता का सब्र जवाब दे चुका है। पिछले पांच साल में नगर परिषद बोर्ड की कार्यशैली को लेकर लोगों में गहरी नाराजगी है। तंज कसते हुए शहरवासी कहते हैं कि बोर्ड भाजपा का रहा, फिर भी सफाई, सड़क, नाली और रोशनी जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए शहर तरसता रहा।अब सवाल यह है कि अगला बोर्ड सिर्फ वादों तक सीमित रहेगा, या जमीन पर काम दिखेगा? जनता अब सिर्फ भरोसा नहीं, नतीजे मांग रही है।
हाइब्रिड फॉर्मूले पर तीखे सवाल- हारा हुआ प्रत्याशी बन सकता है सभापति?
चुनावी चर्चाओं में एक और मुद्दा जमकर गूंज रहा है- हाइब्रिड फॉर्मूला। लोगों का सीधा सवाल है कि जब कोई प्रत्याशी सीधे चुनाव में हार जाए और फिर भी बाद में सभापति या अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंच जाए, तो जनता के वोट की कीमत आखिर बचती ही क्या है? पिछले बोर्ड गठन का अनुभव इस सवाल को और धार दे रहा है, और लोग खुलकर इस व्यवस्था पर उंगली उठा रहे हैं।
कांग्रेस को सहानुभूति तो मिल रही, नेतृत्वविहीनता बनी सबसे बड़ी कमजोरी
भाजपा के प्रति नाराजगी और जिले की लड़ाई लड़ने के श्रेय ने कांग्रेस के पक्ष में माहौल जरूर बनाया है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। बुद्धिजीवी वर्ग बेबाकी से मानता है कि कांग्रेस के पास खैरथल में कोई ऐसा कद्दावर, सर्वमान्य चेहरा नहीं है जो सभी गुटों और कार्यकर्ताओं को एक सूत्र में पिरो सके। दूसरी तरफ भाजपा के पास पूर्व विधायक रामहेत यादव के रूप में मजबूत स्थानीय नेतृत्व मौजूद है। यही अंतर आज कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है- जनता का दिल भले साथ हो, पर नेतृत्व की कमी उसे वोट में बदलने से रोक सकती है।
इतिहास दोहराने का डर सता रहा
पुराना इतिहास इस बार भी सिर उठाकर याद दिलाया जा रहा है। पिछली बार कांग्रेस के पास ज्यादा सीटें होने के बावजूद बोर्ड भाजपा ने बना लिया था। यह महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि रणनीति, एकजुटता और नेतृत्व की कमी का नतीजा माना जा रहा है। अब सवाल है- क्या इस बार भी वही गलती दोहराई जाएगी, या कांग्रेस कोई सबक लेकर मैदान में उतरेगी?
निर्दलीयों की एंट्री ने बढ़ाई दोनों दलों की धड़कनें
टिकट बंटवारे के बाद बगावत करके निर्दलीय के तौर पर मैदान में उतरे प्रत्याशियों ने कई वार्डों का समीकरण पूरी तरह उलट-पुलट कर दिया है। पिछली बार बोर्ड गठन में निर्दलीयों ने जो निर्णायक भूमिका निभाई थी, उसे देखते हुए इस बार भी दोनों प्रमुख दलों की धड़कनें तेज हैं। कहीं ऐसा न हो कि जीत का सेहरा किसी और के सिर बंधे और सत्ता की चाबी निर्दलीयों की मुट्ठी में चली जाए!
अब फैसला जनता की अदालत में
खैरथल नगर परिषद चुनाव अब वार्ड पार्षद चुनने भर का मामला नहीं रहा- यह जिले के अस्तित्व, विकास के हिसाब-किताब, नेतृत्व की परीक्षा और निर्दलीयों के दबदबे की सीधी लड़ाई बन चुका है। दोनों प्रमुख दल अपने-अपने समीकरण साधने में जुटे हैं, प्रत्याशी घर-घर दस्तक दे रहे हैं, और वार्डों का सियासी गणित हर दिन बदल रहा है।
असली सवाल अब सिर्फ इतना है- मतदान के दिन जनता किस मुद्दे को तरजीह देगी, और खैरथल की सत्ता की चाबी आखिर किसके हाथ लगेगी?
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