More
    Homeदेश15 साल बाद मिला इंसाफ! नाबालिग से दुष्कर्म और धर्म परिवर्तन मामले...

    15 साल बाद मिला इंसाफ! नाबालिग से दुष्कर्म और धर्म परिवर्तन मामले में आरोपी को सजा

    ठाणे: महाराष्ट्र के ठाणे जिले में कल्याण की विशेष फास्ट-ट्रैक अदालत ने वर्ष 2011 में एक 15 वर्षीय किशोरी के साथ दुष्कर्म और अवैध धर्मांतरण के मामले में ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने अभियुक्त अजहर उर्फ बदू मुश्ताक कुरैशी (39) को दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष की सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। विशेष अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पीड़िता के नाबालिग होने के कारण उसके द्वारा किए गए धर्म परिवर्तन को किसी भी परिस्थिति में उसकी स्वेच्छा से उठाया गया कदम नहीं माना जा सकता।

    नाबालिग का धर्मांतरण कानूनन अमान्य, सहमति का तर्क खारिज

    अदालत ने सुनवाई के दौरान रेखांकित किया कि घटनाक्रम के समय पीड़िता नाबालिग थी। इस आधार पर पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि पीड़िता आरोपी के साथ गई थी और उसने इस दौरान धार्मिक रीति-रिवाजों में भाग लिया, परंतु विधि के अनुसार एक नाबालिग की सहमति का कोई कानूनी औचित्य नहीं होता। इसलिए धर्मांतरण प्रक्रिया में उसकी भागीदारी को स्वतंत्र इच्छा का परिणाम नहीं माना जा सकता।

    छद्म नाम से रेल टिकट बुक कराना बना षड्यंत्र का मुख्य साक्ष्य

    अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों का अवलोकन करते हुए अदालत ने पाया कि आरोपी ने यात्रा के दौरान फर्जी या अलग नाम से टिकट खरीदा था। कोर्ट ने इसे पूर्व नियोजित साजिश का मुख्य आधार मानते हुए कहा कि आरोपी की मंशा शुरू से ही छलपूर्वक पीड़िता का शारीरिक शोषण करने की थी।

    स्वेच्छा से जाने के आधार पर अपहरण के आरोप से राहत

    मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि डोंबिवली निवासी पीड़िता अपनी सहमति से आरोपी के साथ लखनऊ गई थी। इस विशिष्ट बिंदु को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अभियुक्त को भारतीय दंड संहिता (IPC) की अपहरण से संबंधित धाराओं के आरोपों से मुक्त कर दिया।

    सर्वोच्च न्यायालय की नज़ीर का हवाला, 'पत्नी' होने के कुतर्क से नहीं बच सकता आरोपी

    पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों का संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया कि 18 वर्ष से कम आयु की बालिका के साथ शारीरिक संबंध बनाना IPC की धारा 376 के तहत दुष्कर्म की श्रेणी में आता है। अदालत ने आरोपी के उस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें उसने विवाह या वैवाहिक संबंध का हवाला देकर IPC की धारा 375 के तत्कालीन अपवाद (Exception 2) के तहत राहत मांगी थी।

    पूर्व में जेल में बिताई अवधि सजा में होगी समायोजित, पीड़िता को मुआवजे की सिफारिश

    अदालत ने निर्देश दिए कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान आरोपी द्वारा 5 फरवरी से 12 सितंबर 2012 तक जेल में बिताए गए समय को उसकी कुल 10 वर्ष की सजा की अवधि में समायोजित (छूट) किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, पीड़िता को आर्थिक पुनर्वास हेतु उचित मुआवजा प्रदान करने के लिए मामले को जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (DLSA) को प्रेषित किया गया है। अतिरिक्त लोक अभियोजक सचिन कुलकर्णी के अनुसार, अभियोजन पक्ष ने आरोप सिद्ध करने के लिए पीड़िता सहित कुल सात गवाहों के बयान दर्ज कराए थे।

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here