रांची। झारखंड उच्च न्यायालय ने एक 26 साल पुराने मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि देर रात किसी महिला के घर में दाखिल होना और उसके वस्त्र उठाना अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत बलात्कार या बलात्कार के प्रयास का अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालत के आदेश में संशोधन किया और आरोपी को महिला की गरिमा भंग करने तथा आपराधिक बल प्रयोग से जुड़े अपराध में दोषी माना।
दुष्कर्म के प्रयास के लिए प्रत्यक्ष कृत्य का होना आवश्यक
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने स्पष्ट किया कि बलात्कार के प्रयास का अपराध साबित करने के लिए ऐसा प्रत्यक्ष और विशिष्ट कृत्य होना अनिवार्य है, जो अपराध घटित होने के अत्यंत समीप हो। कोर्ट ने कहा कि केवल ऐसा आचरण जो किसी अपराध की दिशा में बढ़ने का संकेत देता हो, आईपीसी के तहत दुष्कर्म के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता। आरोपी ने घाटशिला सत्र न्यायालय के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
वर्ष 1999 का मामला: चार साल की जेल के खिलाफ याचिका
यह पूरा मामला वर्ष 1999 में दर्ज हुई एक एफआईआर से जुड़ा है। पीड़िता का आरोप था कि आरोपी रात के समय उसके घर में घुसा और दुष्कर्म की मंशा से उसके कपड़े उठाने का प्रयास किया। पुलिस द्वारा दाखिल आरोप पत्र के आधार पर घाटशिला की सत्र अदालत ने आरोपी को बलात्कार के प्रयास का दोषी ठहराते हुए चार वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई थी।
हाईकोर्ट ने सजा में किया संशोधन, 8 माह की हिरासत को माना पर्याप्त
रांची स्थित उच्च न्यायालय ने मामले के तथ्यों का पुनरीक्षण करने के बाद आरोपी को धारा 376/511 (दुष्कर्म का प्रयास) से दोषमुक्त करते हुए धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना) के तहत दोषी माना। कोर्ट ने सजा की अवधि में संशोधन करते हुए कहा कि आरोपी पहले ही लगभग 8 महीने की जेल काट चुका है और मामले की पुरानी पृष्ठभूमि को देखते हुए न्याय के उद्देश्य से यह समय सीमा पर्याप्त है।


