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    उज्जैन में मोहन भागवत बोले- धर्म का अर्थ बंधन नहीं, मुक्ति का मार्ग है

    उज्जैन। उज्जैन के देवास रोड स्थित गीता भवन में आयोजित तीन दिवसीय युवा धर्म संसद के दूसरे दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने दीप प्रज्वलन और वंदे मातरम के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस दौरान उन्होंने युवाओं को धर्म का वास्तविक अर्थ समझाते हुए जीवन में इसके महत्व पर मार्गदर्शन दिया।

    रिलीजन और धर्म का अंतर

    संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि अंग्रेजी शब्दकोश में धर्म के लिए कोई सटीक शब्द नहीं है और 'रिलीजन' का अर्थ धर्म नहीं होता।

    • उत्पत्ति और अर्थ: 'रिलीजन' शब्द की उत्पत्ति 'रिलिजियो' से हुई है, जो किसी को बांधने का संकेत देता है, जबकि भारतीय संस्कृति में धर्म किसी को बांधता नहीं बल्कि मुक्त करता है।

    • स्वामी विवेकानंद के विचार: उन्होंने स्वामी विवेकानंद का स्मरण करते हुए कहा कि भारत एक धर्मप्राण देश है और किसी भी नए विचार को सीखने के लिए पहले मन को स्थिर व खाली करना आवश्यक है।

    युवा धर्म संसद के मुख्य बिंदु और प्रतिभागी

    सेवाज्ञ संस्थानम् द्वारा सिद्धपीठ हनुमत निवास (अयोध्या) के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण जी महाराज के मार्गदर्शन में युवा धर्म संसद का यह छठा संस्करण आयोजित किया जा रहा है।

    • प्रतिभागी: इस आयोजन में देश भर से लगभग 1,700 युवा छात्र-छात्राएं तथा 300 से अधिक विद्वान, शिक्षक, शोधकर्ता और धर्माचार्य हिस्सा ले रहे हैं। प्रसिद्ध गीतकार मनोज मुंतशिर भी इसमें शामिल हुए।

    • प्रमुख विषय: कार्यक्रम में धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और सूचना-विचार संघर्ष जैसे समसामयिक विषयों पर विस्तृत संवाद चल रहा है।

    • धर्म का महत्व: संघ प्रमुख ने कहा कि धर्म केवल बुजुर्गों के लिए नहीं बल्कि युवाओं को सही दिशा दिखाने का माध्यम है। किसी को पीड़ा न देना सबसे बड़ा धर्म है और पीड़ा देना महापाप है।

    इस आयोजन के पिछले संस्करण काशी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार और कांचीपुरम में हो चुके हैं, और इसका अगला (सातवां) संस्करण द्वारका में आयोजित किया जाएगा। उद्घाटन सत्र में कुलगुरु प्रो. श्रीनिवास बरखेड़ी और आशीष कुमार आशु सहित कई गणमान्य संत एवं विचारक उपस्थित रहे।

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