मंदिर में आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म का संदेश, णमोकार महामंत्र के पाठ के साथ हुई विशेष पूजा-अर्चना
लक्ष्मणगढ़। श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे पर्यूषण पर्व एवं दसलक्षण महापर्व के आठवें दिन बुधवार को उत्तम त्याग धर्म की श्रद्धापूर्वक आराधना की गई। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने भगवान का अभिषेक, शांतिधारा और पूजा-अर्चना की तथा णमोकार महामंत्र का पाठ कर धार्मिक वातावरण बनाया।
दिन की शांतिधारा के पुण्यार्जक सुमंत चंद्र जैन रहे। मंदिर में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं ने उत्तम त्याग धर्म के महत्व को समझा और जीवन में त्याग, संयम तथा सद्भावना को अपनाने का संकल्प लिया।
मानक चंद जैन ने समझाया त्याग धर्म का महत्व
इस अवसर पर मानक चंद जैन ने श्रद्धालुओं को उत्तम त्याग धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि त्याग का मूल भाव परिग्रह से मुक्त होना है। उन्होंने कहा कि त्याग की अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग व्याख्या हो सकती है। किसी वस्तु का कुछ समय के लिए त्याग किया जा सकता है तो किसी वस्तु या बुरी आदत का जीवनभर के लिए त्याग भी किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति के जीवन में बुरी आदतों का स्थायी रूप से त्याग करना और अच्छी आदतों को अपनाना आवश्यक है। आवश्यकता से अधिक धन संग्रह नहीं करना, जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं के अतिरिक्त अनावश्यक वस्तुओं का त्याग करना तथा अच्छे कर्मों की ओर बढ़ना भी त्याग धर्म का हिस्सा है।
धन के साथ समय और श्रम का दान भी जरूरी
मानक चंद जैन ने कहा कि समाज और धार्मिक कार्यों में योगदान केवल धन से ही नहीं होता। आज अनेक लोग धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों के लिए धन देने को तैयार रहते हैं, लेकिन समय और श्रम देना कठिन होता जा रहा है।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति किसी भलाई के कार्य में धन नहीं दे पा रहा, लेकिन अपना समय देता है और ईमानदारी से श्रम करता है, वह भी उस पुण्य का उतना ही भागीदार है जितना धन देने वाला व्यक्ति। सेवा कार्यों में समय दान और श्रम दान का भी अपना महत्व है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि दान और त्याग अहंकार, दिखावे या बदले की भावना से नहीं किया जाना चाहिए। इनके पीछे सेवा और परोपकार की शुद्ध भावना होना आवश्यक है।
क्रोध, मान, माया और लोभ का त्याग बताया महत्वपूर्ण
उन्होंने कहा कि भोग-विलास की अनावश्यक वस्तुओं के साथ-साथ क्रोध, मान, माया और लोभ का त्याग सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। इन विकारों को कम करने से मनुष्य के भीतर आत्मिक शांति और संयम की भावना विकसित होती है।
उन्होंने कहा कि राग और द्वेष से स्वयं को मुक्त करने का नाम भी त्याग है। जब तक किसी वस्तु को छोड़ते समय मन में उसके प्रति मोह या सम्मान पाने की इच्छा बनी रहती है, तब तक त्याग की भावना पूर्ण नहीं मानी जा सकती।
दान और त्याग में बताया अंतर
मानक चंद जैन ने दान और त्याग के बीच अंतर बताते हुए कहा कि दान में व्यक्ति अपनी आवश्यकता के लिए कुछ रखते हुए दूसरे को कुछ देता है, जबकि त्याग में वस्तु को पूरी तरह छोड़ने की भावना होती है।
उन्होंने कहा कि दान प्रायः किसी जरूरतमंद या सुपात्र की अपेक्षा को ध्यान में रखकर किया जाता है, जबकि त्याग में किसी से अपेक्षा नहीं रखी जाती। त्याग का उद्देश्य वस्तु, मोह या विकार से स्वयं को अलग करना होता है।
सुपात्र को दिया दान कल्याणकारी
धार्मिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आचार्यों ने सुपात्र को दिए गए दान को कल्याणकारी बताया है, जबकि कुपात्र को दिया गया दान कर्मबंधन का कारण बन सकता है। वहीं इच्छा और अहंकार से रहित दान आत्मकल्याण की भावना को मजबूत करता है।
उन्होंने कहा कि उत्तम त्याग धर्म मनुष्य को सांसारिक बंधनों से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ाता है और मोक्ष के मार्ग का एक महत्वपूर्ण सोपान माना गया है।
अपनी शक्ति के अनुसार त्याग धर्म अपनाने का आह्वान
कार्यक्रम में श्रद्धालुओं से आह्वान किया गया कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान, सेवा, समय और श्रम की भावना से जुड़े तथा जीवन में त्याग धर्म को धारण करे।
धार्मिक आयोजन के दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की सहभागिता रही। पूजा-अर्चना और महामंत्र के पाठ के बीच दसलक्षण महापर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म का संदेश दिया गया।
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