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    बिल्डर राजविंदर सिंह की अग्रिम जमानत याचिका खारिज, 18 करोड़ की रंगदारी का मामला

    मुंबई। बांद्रा की एक पुनर्विकास परियोजना से जुड़े रंगदारी और जबरन वसूली के मामले में सत्र न्यायालय ने राजलक्ष्मी कंपनीज के मालिक और बिल्डर राजविंदर सिंह को तगड़ा झटका दिया है। अदालत ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए उन्हें कोई भी राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। मुंबई क्राइम ब्रांच की एंटी-एक्सटॉर्शन सेल ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए अदालत को बताया कि आरोपी ने पहले 18 करोड़ रुपये की भारी-भरकम फिरौती मांगी थी, जिसे बाद में कथित तौर पर घटाकर 11 करोड़ रुपये तय किया गया था। इस हाई-प्रोफाइल मामले में कुख्यात गैंगस्टर छोटा राजन गिरोह से जुड़े लोगों की संलिप्तता के तार भी जुड़ते नजर आ रहे हैं। पुलिस के रिकॉर्ड में सिंह और रेमी फर्नांडिस को इस मामले में फरार आरोपी के तौर पर दर्ज किया गया है।

    पांच आरोपियों की हो चुकी है गिरफ्तारी और साजिश का खुलासा

    पुलिस ने पिछले महीने बांद्रा की एक पॉश संपत्ति से जुड़े इस कथित रंगदारी मामले में एक भाई-बहन समेत कुल पांच लोगों को पहले ही दबोच लिया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता एक प्रॉपर्टी फर्म का बिजनेस हेड है, जिसकी कंपनी बांद्रा के पेरेरा रोड स्थित उक्त संपत्ति के पुनर्विकास का काम संभाल रही है। आरोप है कि इस प्रोजेक्ट में रुकावटें पैदा करने, फर्जी मुकदमे दर्ज कराने और राजन गिरोह के नाम पर डरा-धमकाकर कंपनी को बचाने की एवज में पहले 18 करोड़ और बाद में 11 करोड़ रुपये वसूलने की साजिश रची गई थी।

    10 लाख रुपये देने और साइट पर गुर्गे भेजने का गंभीर आरोप

    जांच एजेंसी ने अदालत में दावा किया कि मुख्य आरोपी राजविंदर सिंह ने कथित तौर पर 10 लाख रुपये की शुरुआती रकम मुहैया कराई थी, जिसके बाद कुछ संदिग्ध लोगों को जबरन पुनर्विकास स्थल पर भेजा गया था। पुलिस के पास सिंह के खिलाफ वीडियो रिकॉर्डिंग, कॉल डिटेल्स, मोबाइल डेटा और संदिग्ध वित्तीय लेन-देन जैसे पुख्ता इलेक्ट्रॉनिक व वित्तीय सबूत मौजूद हैं। हालांकि, बचाव पक्ष के वकीलों ने इन تمام आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि सिंह का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है और संपत्ति से जुड़े एक पुराने विवाद के कारण उन्हें झूठा फंसाया जा रहा है। उनके वकीलों ने तर्क दिया कि उनका लेन-देन कानूनी रूप से वास्तविक था और उन्होंने खुद चैरिटी कमिश्नर के समक्ष इसकी शिकायत की थी।

    अदालत ने माना हिरासत में पूछताछ जरूरी

    अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पी.ए. साबले ने मामले से जुड़े सभी दस्तावेजों और साक्ष्यों की बारीकी से समीक्षा करने के बाद अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आरोपी के खिलाफ मिले सबूत केवल किसी सह-आरोपी के बयानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि 10 लाख रुपये के कथित भुगतान, इलेक्ट्रॉनिक चैट्स और वित्तीय लेन-देन की गहराई से जांच होनी बेहद जरूरी है। अदालत ने माना कि मनी ट्रेल का पता लगाने, डिजिटल सबूतों को खंगालने और इस आपराधिक साजिश में शामिल अन्य छिपे चेहरों को बेनकाब करने के लिए राजविंदर सिंह से कस्टोडियल (हिरासत में) पूछताछ की आवश्यकता है। गौरतलब है कि यह सनसनीखेज मामला पहले बांद्रा पुलिस थाने में दर्ज किया गया था, जिसे बाद में उच्चस्तरीय जांच के लिए मुंबई क्राइम ब्रांच की एंटी-एक्सटॉर्शन सेल को ट्रांसफर कर दिया गया था।

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