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    सूचना का अधिकार ( RTI ) : दो दशकों का सफर और चुनौतियां

    सूचना का अधिकार स्थापना दिवस (12 अक्टूबर) पर विशेष

    आत्मदीप, पूर्व सूचना आयुक्त

    12 अक्टूबर, 2005 को जब देश में सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हुआ तो यह हमारे लोकतंत्र में शासन और नागरिक के संबंध को बदलने वाली ऐतिहासिक क्रांति थी। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में सरकार और जनता के रिश्ते को पुनर्परिभाषित करने वाली युगांतकारी घटना थी। इसको लागू होने के दो दशक से अधिक समय के बाद गौर करने की जरूरत है कि यह कानून अपने उद्देश्य में कितना सफल रहा और कौन सी चुनौतियों से घिर गया है।

    संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के रूप में उभरे इस अधिकार ने आम आदमी को जवाबदेही मांगने का अचूक औजार दिया। लोगों को भरोसा दिया कि सरकारी खजाने की पाई-पाई पर उनका हक है और सरकारी तंत्र सीधे तौर पर जनता के प्रति जवाबदेह है। आरटीआई ने सत्ता के गलियारों में बंद फाइलों को जनता के सामने लाने का बड़ा काम किया। बंद कमरों में चलने वाली शासन व्यवस्था को लोगों के आगे बेपर्दा किया। नतीजे में जानने के हक ने राशन वितरण से लेकर अरबों रूपये के घोटालों को उजागर करने में निर्णायक भूमिका निभाई। इसने लोगों को सिर्फ वोट देने वाले मतदाता से आगे बढकर सजग-सतर्क पहरेदार बना दिया। इसने स्वीकृत बजट व खर्च, सार्वजनिक नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों आदि में पारदर्शिता लाने में मदद की। सरकारी तंत्र की मनमानी पर प्रभावी अंकुश लगाया,पर 21 बरस बाद भी यह कानून गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। लोक सूचना अधिकारी अक्सर धारा 8 व 11 का दुरुपयोग करते हुये सूचना देने से बचने का प्रयास करते हैं। वे आरटीआई के निराकरण के लिये निर्धारित 30 दिन की अधिकतम अवधि में जानकारी नहीं देते या अधूरे / भ्रामक दस्तावेज देकर खानापूर्ति करते हैं। आरटीआई व प्रथम अपील के निपटारे की तय सीमा की अनदेखी करना आम चलन बन चुका है।

    2019 में इस कानून में संशोधन कर सूचना आयुक्तों का दर्जा, कार्यकाल व वेतन घटा कर इस अधिकार के संरक्षक सूचना आयोगों की महत्ता कम कर दी गई। आयुक्तों के कार्यकाल व वेतन को आरटीआई एक्ट में निर्धारित प्रावधान से हटा कर सरकार के अधीन कर देने से आयोगों की स्वायत्तता, संस्थागत स्वतंत्रता प्रभावित हुई है। वहीं, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून के जरिये धारा 8 (1)(जे) के मूल प्रावधान को खत्म कर व्यक्तिगत गोपनीयता के नाम पर सार्वजनिक महत्व की जानकारी भी छिपाने का औजार नौकरशाही को दे दिया गया है। आरटीआई एक्ट की इस मूल धारा में किये गये आमूलचूल बदलाव ने सार्वजनिक जवाबदेही से जुडे़ मामलों में भी व्यक्तिगत जानकारी का बहाना बनाकर सूचना छिपाने का रास्ता खोल दिया है।

    केंद्रीय सूचना आयोग व राज्य सूचना आयोगों में लम्बित मामलों का लगातार बढ़ता अंबार ‘समय पर न्याय’ की संवैधानिक अपेक्षा पर पानी फेर रहा है। आयोगों में करीब 4 लाख अपीलें व शिकायतें लम्बित पड़ी हैं। कई आयोगों में एक मामले के निपटारे में 2 से 4 वर्ष तक का लंबा समय लग रहा है। यह देरी मांगी गई सूचना की प्रासंगिकता को ही खत्म कर दे रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह है समय पर और पर्याप्त संख्या में सूचना आयुक्तों की नियुक्तियां नहीं करना।

    ज्यादातर सरकारें मुख्य सूचना आयुक्त व सूचना आयुक्तों के पद रिक्त होने से पहले नई नियुक्तियों की प्रक्रिया शुरू नहीं करती। नतीजे में ये पद लंबे समय तक खाली रहते हैं। इससे आयोगों में लम्बित मामले बढ़ते जाते हैं। कुछ राज्यों में तो सभी पद रिक्त होने से आयोगों का काम लंबे समय तक ठप रहा है। ऐसे में हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को दखल देकर नई नियुक्तियां करने के निर्देश देने पड़े हैं।

    नये आयुक्तों के नियुक्त होने तक रिटायर होेने वाले आयुक्तों का कार्यकाल बढ़ाने का प्रावधान कर यह समस्या हल की जा सकती है। जैसे कि सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से केंद्र सरकार एनजीटी के सेवानिवृत्त होने जा रहे सदस्यों का कार्यकाल नई नियुक्तियां होने तक बढ़ा रही है।

    अब तक सूचना के अधिकार की पहुंच देश की सिर्फ 2 प्रतिशत आबादी तक ही हो पाई है। ग्रामीण क्षेत्रों, महिलाओं, वंचित तबकों व अल्पसंख्यकों का बडा हिस्सा इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। इसके प्रति शासन-प्रशासन का उदासीन रवैया भी निराशाजनक रहा है। आरटीआई को सुशासन के उपकरण के रूप में देखने की बजाय सरकारी कामकाज में बाधा की शक्ल में देखने के अनुचित रवैये में सुधार की सख्त जरूरत है। आरटीआई को स्कूली सिलेबस में शामिल किया जाना चाहिये। आरटीआई को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिये पंचायत, ब्लॉक व जिला स्तर पर आरटीआई सहायता केंद्र संचालित किये जाने चाहिए और जन जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिये।

    आत्मदीप

    लेखक – मध्यप्रदेश के पूर्व सूचना आयुक्त आत्मदीप है जिनकी गिनती देश के ख्यातनाम पत्रकारों में होती है। वे देश के बड़े मीडिया ग्रुप इंडियन एक्सप्रेस के हिंदी अखबार जनसत्ता के राजस्थान व मध्यप्रदेश में लंबे समय तक प्रभारी रहे। बाद में मध्यप्रदेश सरकार ने उन्हें सूचना आयुक्त का दर्जा दिया। मो. 9425010099

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