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    जंतर-मंतर का युग समाप्त: अब दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के लिए 3 नए मैदान तय, सियासत गरमाई

    दिल्ली में विरोध के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी और सीबीडी ग्राउंड के नाम चर्चा में; फैसले पर उठे सवाल

    ​नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर बीते तीन दशक से आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और नागरिक आवाज़ों का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। लेकिन, अब यह प्रदर्शन स्थल नहीं रहेगा। दिल्ली पुलिस ने सोमवार को एक बड़े फैसले में जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया है। ​गृह मंत्रालय की एक विशेष समिति की सिफारिशों के आधार पर दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार ने इस संबंध में आधिकारिक नोटिस जारी किया।

    नए बदलाव के तहत अब राजधानी में किसी भी तरह के धरना-प्रदर्शन, रैली या जन-आंदोलन के लिए तीन नए स्थान निर्धारित किए गए हैं। इनमें ​रामलीला मैदान (सेंट्रल दिल्ली), ​बुराड़ी मैदान (नॉर्थ दिल्ली) और सीबीडी ग्राउंड (ईस्ट दिल्ली) होंगे।

    कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने इस फैसले पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है।

    ​सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री पर निशाना साधा। उसने लिखा: ​यह फैसला पूरी तरह से अस्वीकार्य है। जंतर-मंतर भारत की जनता का है। क्या गृह मंत्रालय ने यह फैसला लेने से पहले देश की जनता, हितधारकों या सामाजिक संगठनों से परामर्श किया? लिखकर ले लीजिए—जिस तरह से जनता के जंतर-मंतर को छीना जा रहा है, उसी तरह जल्द ही लोकतंत्र को भी डी-नॉटीफाई कर दिया जाएगा। यह फैसला लोगों के विरोध करने और शांतिपूर्ण सभा के मौलिक अधिकार पर सीधा हमला है। अब पूरा देश जंतर-मंतर बन रहा है!

    ​1993 से शुरू हुआ था विरोध के केंद्र का सफर

    ​जंतर-मंतर के प्रदर्शन स्थल बनने की कहानी काफी दिलचस्प है। साल 1993 से पहले दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों का मुख्य केंद्र इंडिया गेट के पास स्थित बोट क्लब हुआ करता था, जहां से संसद भवन और राजपथ का सीधा दृश्य दिखता था।

    ​हालांकि, 1988 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दिग्गज किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में हुए किसान आंदोलन और बाद में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद आंदोलन के कारण तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने बोट क्लब पर प्रदर्शनों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया।

    ​इसके बाद, 1993 में बिना किसी औपचारिक अध्यादेश या सरकारी घोषणा के, टॉल्स्टॉय मार्ग से अशोक रोड गोलचक्कर को जोड़ने वाली जंतर-मंतर की यह सड़क अपने आप एक नए डिसेंट स्क्वायर (विरोध स्थल) के रूप में उभरकर सामने आई। यह दिल्ली की इकलौती ऐसी सड़क बन गई, जहां धारा 144 लागू नहीं होती थी।

    ​सरकारों के लिए भी यह जगह मुफीद थी। संसद के करीब होने के बावजूद जंतर-मंतर इतना बड़ा नहीं था कि बहुत बड़ी भीड़ को संभाल न सके, और इसके केवल दो मुख्य प्रवेश/निकास द्वार होने के कारण सुरक्षा बलों के लिए भीड़ को नियंत्रित करना आसान था।

    ​कानूनी अड़चनें और सुप्रीम कोर्ट का रुख

    ​जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों को लेकर कानूनी लड़ाई भी लड़ी गई हैं:

    ​अक्टूबर 2018 : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने स्थानीय निवासियों की शिकायतों (ध्वनि प्रदूषण और गंदगी) के आधार पर जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर रोक लगाने और इन्हें रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था। ट्रिब्यूनल ने तर्क दिया था कि जंतर-मंतर दिल्ली मास्टर प्लान में रिहायशी इलाका है। इसे प्रदर्शन स्थल के रूप में कोई आधिकारिक कार्यकारी मंजूरी नहीं मिली है।

    ​जुलाई 2018 : सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर और बोट क्लब पर प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध को खारिज कर दिया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि कड़े नियमों और भीड़ की सीमाओं के अधीन रहकर नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है।

    ​ऐतिहासिक आंदोलनों का गवाह रहा है जंतर-मंतर

    ​जंतर-मंतर केवल एक सड़क नहीं, बल्कि देश के कई ऐतिहासिक और राजनीतिक बदलावों की जन्मभूमि रही है:

    ​अन्ना आंदोलन (2011): 5 अप्रैल 2011 को महाराष्ट्र के समाजसेवी अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ और जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की थी। इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण जैसे नाम जुड़े, जिससे आगे चलकर आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ।

    ​तमिलनाडु के किसानों का अनोखा प्रदर्शन (2017): मार्च-अप्रैल 2017 में तमिलनाडु के सूखा पीड़ित किसानों ने 40 दिनों तक जंतर-मंतर पर अनूठा और दर्दनाक प्रदर्शन किया। उन्होंने खोपड़ियों के साथ, मुंह में मरे हुए चूहे दबाकर और गले पर कुल्हाड़ी रखकर विरोध जताया। तत्कालीन मुख्यमंत्री ई. पलानीस्वामी द्वारा मांगों को केंद्र तक पहुंचाने के आश्वासन के बाद यह धरना समाप्त हुआ था।

    ​अन्य बड़े आंदोलन:

    ​2012: निर्भया कांड के बाद देशव्यापी विरोध और न्याय की मांग।

    ​2014: पूर्वोत्तर के 19 वर्षीय छात्र निडो तानिया की हत्या के खिलाफ न्याय की मांग।

    ​अगस्त 2019: जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के खिलाफ छात्रों और कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन।

    ​दिसंबर 2019: नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ विशाल प्रदर्शन, जहाँ प्रदर्शनकारियों ने नमाज़ पढ़ रहे लोगों के लिए मानव श्रृंखला बनाई थी।

    ​मार्च 2023: पंजाब के किसान यूनियनों द्वारा कर्ज माफी और MSP की मांग को लेकर किया गया विशाल प्रदर्शन।

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