जंतर-मंतर से रामलीला मैदान तक बढ़ती सत्ता विरोध से दूरी?
के. पी. मलिक, वरिष्ठ पत्रकार ।
दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों की कहानी केवल धरना-स्थलों के बदलने की कहानी नहीं है। यह इस बात का भी इतिहास है कि सत्ता जनता की असहमति को कितनी जगह देती है और नागरिकों की आवाज़ सुनने के लिए कितनी तत्पर रहती है। कभी इंडिया गेट के पास बोट क्लब पर उठने वाले नारों की गूंज सत्ता के गलियारों तक पहुँचती थी, फिर जंतर-मंतर विरोध का प्रमुख ठिकाना बना और अब रामलीला मैदान जैसे स्थलों की भूमिका पर चर्चा हो रही है। सवाल यह है कि क्या यह बदलाव केवल सुरक्षा और यातायात की जरूरतों का परिणाम है, या इसके साथ विरोध की आवाज़ और सत्ता के बीच दूरी भी बढ़ रही है?
लोकतंत्र में सरकार चलाने का अधिकार बहुमत से मिलता है, लेकिन असहमति व्यक्त करने का अधिकार भी लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। चुनावों के बीच जनता केवल दर्शक नहीं बन जाती। उसे सरकार के फैसलों पर सवाल उठाने, अपनी समस्याएँ सामने रखने और नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार है। इसलिए किसी प्रदर्शन-स्थल का सवाल महज भूगोल या प्रशासनिक व्यवस्था का विषय नहीं है; इसका संबंध नागरिक अधिकारों, राजनीतिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक संस्कृति से भी है।
बोट क्लब: जब सत्ता के दरवाजे तक पहुँचता था विरोध
आजादी के बाद कई दशकों तक इंडिया गेट के निकट बोट क्लब का इलाका बड़े जन-प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा। संसद और केंद्रीय सत्ता के नजदीक होने के कारण यहां होने वाले आंदोलनों को राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व मिलता था। प्रदर्शनकारियों की आवाज़ केवल सड़कों पर सुनाई नहीं देती थी, बल्कि वह सत्ता के लिए भी एक प्रत्यक्ष संदेश बनती थी। बोट क्लब के आंदोलनों ने यह स्थापित किया कि लोकतंत्र में जनता केवल पांच साल में एक बार मतदान करने वाली भीड़ नहीं है। वह सरकार के कामकाज पर लगातार निगाह रखने वाली और जरूरत पड़ने पर सड़कों पर उतरने वाली सक्रिय राजनीतिक शक्ति भी है।।हालांकि, बड़े प्रदर्शनों से यातायात, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था संबंधी चुनौतियाँ भी पैदा होती थीं। समय के साथ इन चिंताओं के आधार पर बोट क्लब में बड़े आयोजनों पर पाबंदियाँ बढ़ीं और विरोध के लिए दूसरे स्थानों को प्रमुखता मिलने लगी। इस बदलाव को केवल राजनीतिक मंशा से जोड़ना सही नहीं होगा, लेकिन इसके लोकतांत्रिक प्रभावों की समीक्षा करना भी उतना ही जरूरी है।
जंतर-मंतर: विरोध के लिए तय हुई जगह क्यों नहीं रही
बोट क्लब से प्रदर्शन हटने के बाद जंतर-मंतर दिल्ली में विरोध की राजनीति का प्रमुख केंद्र बना। वर्ष 1993 से जंतर-मंतर की पहचान ऐसे स्थल के रूप में विकसित हुई, जहां नागरिक संगठन, किसान, कर्मचारी, छात्र और राजनीतिक दल अपनी मांगें उठाने के लिए जुटते रहे। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों तक, इस जगह ने असहमति की आवाज़ को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। लेकिन अब विरोध के इस पारंपरिक ठिकाने का स्वरूप भी बदल रहा है। 12 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाकर रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान को नए स्थलों के रूप में तय किया है। यह बदलाव गृह मंत्रालय की समिति की सिफारिशों से जुड़ा बताया गया है।
यह फैसला केवल किसी सड़क या मैदान के इस्तेमाल का मामला नहीं है। जंतर-मंतर की पहचान उसकी भौगोलिक स्थिति से भी बनी थी। संसद और केंद्रीय सरकारी प्रतिष्ठानों के अपेक्षाकृत निकट होने के कारण वहां प्रदर्शन करने वालों को अपनी बात सीधे सत्ता के सामने रखने का प्रतीकात्मक अवसर मिलता था। रामलीला मैदान में भी बड़े राजनीतिक आंदोलन हो चुके हैं और वह विरोध के लिए कम महत्वपूर्ण स्थान नहीं है। बुराड़ी और सीबीडी मैदान भी प्रदर्शन के लिए निर्धारित किए गए हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या किसी प्रदर्शन को केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेज देना पर्याप्त है? क्या नए स्थलों पर पहुंच, सार्वजनिक परिवहन, मीडिया की मौजूदगी और संबंधित अधिकारियों तक प्रदर्शनकारियों की बात पहुंचने की व्यवस्था भी उतनी ही प्रभावी होगी? प्रदर्शन की अनुमति देना और प्रदर्शन को प्रभावी बनाना दो अलग-अलग बातें हैं।
सुरक्षा जरूरी, लेकिन क्या हर असहमति सुरक्षा का सवाल है?
दिल्ली देश की राजधानी है। यहां संसद, राष्ट्रपति भवन, केंद्रीय मंत्रालय, विदेशी दूतावास और अनेक महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान हैं। वीवीआईपी आवागमन, यातायात और सुरक्षा की चिंताओं को नकारा नहीं जा सकता। हजारों लोगों के प्रदर्शन से आम नागरिकों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। इसलिए प्रशासन को प्रदर्शन के लिए नियम बनाने और उचित प्रतिबंध लगाने का अधिकार है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर प्रतिबंध इतने व्यापक हो जाएं कि शांतिपूर्ण विरोध करना ही कठिन हो जाए। किसी प्रदर्शन की आशंका के आधार पर पूरे इलाके में आवाजाही सीमित करना, सार्वजनिक परिवहन बाधित करना या प्रदर्शनकारियों को उनके निर्धारित स्थल तक पहुंचने से रोकना—इन कदमों की आवश्यकता और औचित्य का अलग-अलग परीक्षण होना चाहिए। केवल सुरक्षा का उल्लेख कर देना हर प्रतिबंध को उचित नहीं बना देता। हाल के दिनों में दिल्ली में प्रदर्शनकारियों की आवाजाही पर लगी पाबंदियों, हिरासत में लिए जाने और मेट्रो सेवाओं पर प्रतिबंधों को लेकर भी सवाल उठे हैं। इन घटनाओं ने एक बार फिर यह बहस सामने रखी है कि प्रशासनिक नियंत्रण और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कहां होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की कसौटी: नियंत्रण हो, लेकिन अधिकार खत्म न हों
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण ढंग से, बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर सार्वजनिक व्यवस्था सहित कुछ आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसलिए किसी नागरिक या संगठन को अपनी पसंद के किसी भी स्थान पर, किसी भी समय और कितनी भी संख्या में प्रदर्शन करने का असीमित अधिकार नहीं है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।।जुलाई 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर और बोट क्लब के आसपास विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े प्रश्नों पर विचार किया था। अदालत ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और स्थानीय निवासियों, आम नागरिकों तथा सार्वजनिक व्यवस्था के हितों के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया।इसका सीधा अर्थ है कि प्रशासन प्रदर्शन को व्यवस्थित कर सकता है, लेकिन नियमन का उद्देश्य विरोध को लगभग असंभव बना देना नहीं हो सकता। सरकार और पुलिस के सामने चुनौती यह है कि वे सुरक्षा संबंधी वास्तविक जोखिमों का आकलन करें, भीड़ के आकार के अनुसार व्यवस्था बनाएं और जहां जरूरी हो, वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराएं। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों की भी जिम्मेदारी है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखें और दूसरे नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करें।।लोकतंत्र में अधिकार और जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
क्या रामलीला मैदान तक पहुंचना ही विरोध की पहली परीक्षा?
यहां एक व्यावहारिक सवाल भी है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने आने वाला व्यक्ति संसद और केंद्रीय मंत्रालयों के नजदीक अपनी बात रखना चाहता था। अब यदि उसे रामलीला मैदान, बुराड़ी या पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान जाना होगा, तो क्या इन सभी स्थलों पर पहुंचने, प्रदर्शन करने और मीडिया के माध्यम से अपनी बात रखने की समान सुविधाएं होंगी? क्या किसी छोटे कर्मचारी संगठन, किसान समूह, बेरोजगार युवाओं या सीमित संसाधनों वाले नागरिक मंच के लिए इन स्थलों तक पहुंचना उतना ही आसान होगा? क्या प्रदर्शन के लिए अनुमति की प्रक्रिया पारदर्शी होगी? क्या प्रशासन समय पर निर्णय देगा? क्या अनुमति न मिलने पर कोई प्रभावी और समयबद्ध अपील व्यवस्था उपलब्ध होगी?
इन सवालों का जवाब केवल सरकारी आदेश में दर्ज स्थानों के नाम से नहीं मिलेगा। इसके लिए नए नियमों, अनुमति की प्रक्रिया, परिवहन व्यवस्था और वास्तविक क्रियान्वयन की समीक्षा जरूरी होगी। यदि वैकल्पिक स्थलों पर सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को बिना भेदभाव के अनुमति मिलती है, तो स्थान परिवर्तन प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप साबित हो सकता है। लेकिन यदि दूरी, अनुमति और आवाजाही की पाबंदियां मिलकर विरोध को कमजोर करती हैं, तो यह चिंता का विषय होगा।।सत्ता को असहमति सिर्फ़ दिखाई नहीं सुनाई भी देनी चाहिए। लोकतंत्र की खूबसूरती केवल इस बात में नहीं है कि सरकार चुनाव जीतकर सत्ता में आई है। उसकी मजबूती इस बात से भी तय होती है कि वह अपने विरोधियों, आलोचकों और असहमत नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करती है। जो सरकार जनता के समर्थन पर भरोसा करती है, उसके लिए आलोचना को सुनना भी शासन का हिस्सा होना चाहिए। विरोध करने वाला प्रत्येक व्यक्ति सही हो, यह जरूरी नहीं; लेकिन उसकी बात सुनने का अवसर छीन लेना भी समाधान नहीं है।
बहरहाल, बोट क्लब से जंतर-मंतर और अब रामलीला मैदान, बुराड़ी तथा सीबीडी मैदान तक का यह बदलाव एक बड़े लोकतांत्रिक प्रश्न को सामने रखता है। प्रदर्शन का स्थान बदल सकता है, उसकी अनुमति की शर्तें बदल सकती हैं और सुरक्षा के नियम भी बदल सकते हैं। लेकिन असहमति व्यक्त करने का संवैधानिक अधिकार इन बदलावों के बीच सुरक्षित रहना चाहिए।आखिरकार, राजधानी में व्यवस्था बनाए रखना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन व्यवस्था का अर्थ यह नहीं हो सकता कि सत्ता को असुविधाजनक लगने वाली आवाज़ें उससे दूर कर दी जाएं। बोट क्लब पर आवाज़ उठी, जंतर-मंतर ने उसे मंच दिया और अब रामलीला मैदान की बारी है। सवाल मैदान का नहीं, उस दूरी का है जो जनता और सत्ता के बीच बन सकती है। क्या विरोध का पता बदलने के साथ जनता की आवाज़ भी सत्ता से दूर होती जाएगी, या सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि नागरिकों की असहमति चाहे किसी भी निर्धारित स्थल से उठे, उसकी गूंज निर्णय लेने वालों तक पहुंचे? क्योंकि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ सुनना सत्ता की मेहरबानी नहीं, उसकी संवैधानिक जवाबदेही है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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