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    दशहरा डिकोड कार्यशाला में बच्चों ने खोजा अपने भीतर का रावण

    अनूठी कार्यशाला में बुरी आदतों की पहचान, रचनात्मक गतिविधियों से सीखा अच्छाई का महत्व

    अलवर। डिजिटल युग में पली-बढ़ी नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और त्योहारों के वास्तविक अर्थ से जोड़ने के उद्देश्य से मोती डूंगरी स्थित बिंगो में दशहरा डिकोड कार्यशाला आयोजित की गई। Allure Reads Book Club और Art Splash की संयुक्त पहल के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में बच्चों ने रामायण की कहानी, कला और रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से अच्छाई-बुराई के अंतर को समझा।

    कार्यशाला का उद्देश्य बच्चों को दशहरे का महत्व केवल कहानी या उत्सव तक सीमित रखने के बजाय उसके संदेश को अपने व्यवहार और जीवन से जोड़ने के लिए प्रेरित करना था।

    रामायण की कहानी से समझाए जीवन-मूल्य

    कार्यशाला में लेखिका एवं पेरेंटिंग कोच अर्चना वशिष्ठ ने रामायण की रोचक कहानी के जरिए बच्चों को अच्छाई, बुराई और जीवन-मूल्यों के बारे में बताया। कहानी के माध्यम से उन्हें समझाया गया कि दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और इसका संदेश अपने जीवन में भी अपनाया जा सकता है।

    वहीं, मीनल जैन ने कला और रचनात्मक गतिविधियों के जरिए बच्चों की भागीदारी सुनिश्चित की। इससे बच्चों को अपनी कल्पनाशीलता व्यक्त करने और सीखी गई बातों को गतिविधियों के माध्यम से समझने का अवसर मिला।

    कागज पर लिखीं बुरी आदतें, रावण के पुतले पर चिपकाईं

    कार्यशाला का सबसे खास हिस्सा वह गतिविधि रही, जिसमें बच्चों ने अपनी बुरी आदतों को कागज पर लिखा और उन्हें रावण के पुतले पर चिपकाया। इसके बाद प्रतीकात्मक रूप से उन आदतों का दहन किया गया।

    इस गतिविधि ने बच्चों को अपनी कमियों पर विचार करने, गलत आदतों को पहचानने और उनमें सकारात्मक बदलाव लाने का संदेश दिया। बच्चों ने इस प्रक्रिया के जरिए समझा कि रावण के पुतले का दहन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि अपने भीतर मौजूद बुराइयों को दूर करने का प्रतीक भी है।

    परंपरा और रचनात्मकता का संगम

    कार्यशाला ने बच्चों को त्योहार के सांस्कृतिक महत्व से जोड़ने के साथ आत्ममंथन का अवसर भी दिया। कहानी, कला और सहभागिता आधारित गतिविधियों के मेल ने दशहरे के संदेश को बच्चों के लिए सहज और रोचक बनाया।

    Allure Reads Book Club और Art Splash की यह पहल परंपरा, रचनात्मकता और व्यवहारिक सीख का संगम बनी। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि त्योहारों का वास्तविक महत्व तभी सार्थक होता है, जब उनसे मिलने वाली सीख को रोजमर्रा के जीवन में अपनाया जाए।

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