वाशिंगटन। खगोलविदों ने अंतरिक्ष में पहली बार एक अनोखे हरे रंग के तारे की खोज की है, जिसे 'कॉस्मिक ज़ॉम्बी' नाम दिया गया है। अंतरिक्ष में एक मृत सफेद बौना तारा अपनी मौत के बाद खुद अपने ही चट्टानी ग्रहों को निगलता जा रहा है, और इसी अजीबोगरीब प्रक्रिया के कारण इसका रंग हरा हो चुका है। इस अभूतपूर्व रिसर्च ने तारों के रंग से जुड़े अब तक के पारंपरिक वैज्ञानिक नियमों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है, क्योंकि अभी तक यह माना जाता था कि किसी भी तारे का रंग मुख्य रूप से केवल उसके तापमान पर निर्भर करता है।
डब्लूडी जे1330प्लस 6435 की विशेषता
धरती से लगभग 326 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित 'डब्लूडी जे1330प्लस 6435' नामक इस अनूठे तारे पर यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक के खगोलविदों ने यह विस्तृत रिसर्च की है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, सूरज के आकार वाले तारे जब अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेते हैं, तो वे सफेद बौने तारे बन जाते हैं। यदि ऐसे मृत सितारे अपने इर्द-गिर्द मौजूद चट्टानी ग्रहों को खाना शुरू कर दें, तो उनका रंग हरा हो सकता है। इस हरे तारे के वायुमंडल में सोडियम और कैल्शियम की भारी मात्रा पाई गई है, जिसने इसे यह अनोखा और डरावना रूप दिया है।
रंग बदलने के पीछे की वैज्ञानिक वजह
अब तक विज्ञान में यह स्थापित था कि ठंडे तारे नारंगी, मध्यम तारे सफेद और सबसे गर्म तारे हल्के नीले रंग के दिखाई देते हैं। लेकिन इस नए अध्ययन ने साबित कर दिया है कि मृत तारे हरा, गुलाबी, पीला और बैंगनी रंग भी अख्तियार कर सकते हैं। इन सफेद बौने तारों के अलग-अलग रंगों के पीछे उनका अत्यधिक भारी घनत्व सबसे बड़ी वजह है। जब सूर्य के बराबर द्रव्यमान वाले तारों का ईंधन खत्म हो जाता है, तो उनका केंद्र अंदर की तरफ ढह जाता है, जिससे इनका घनत्व सूर्य की सतह से लाखों गुना ज्यादा बढ़ जाता है।
ऐसी चरम परिस्थितियों में कार्बन, कैल्शियम और सोडियम जैसे तत्व घने हीलियम प्लाज्मा के साथ मिलकर प्रकाश की अधिक तरंगों को सोख लेते हैं, जिससे तारे का रंग बदल जाता है। डब्लूडी जे1330प्लस 6435 लगातार अपने साथी ग्रहों के मलबे को निगल रहा है, जिससे इसके वायुमंडल में कैल्शियम, लिथियम और सोडियम का अंबार लग गया है। कंप्यूटर सिमुलेशन और मॉडलों ने भी यह पुष्टि कर दी है कि इन्हीं तत्वों की मौजूदगी की वजह से यह तारा पूरी तरह हरा दिखाई दे रहा है।
ब्रह्मांड के अन्य रंग-बिरंगे मृत तारे
वैज्ञानिक इतिहास में इससे पहले किसी भी जीवित या मृत तारे के हरे होने का कोई प्रामाणिक प्रमाण नहीं मिला था, जिससे यह ब्रह्मांड का पहला खोजा गया हरा तारा बन गया है। इसके अलावा, शोध में यह भी खुलासा हुआ है कि रासायनिक संरचना के आधार पर सफेद बौने तारों के कई अन्य रंग भी हो सकते हैं। जिन तारों के वायुमंडल में कार्बन प्रचुर मात्रा में होता है, वे गुलाबी या बैंगनी रंग में चमकते हैं, जबकि प्राचीन ग्रहों और क्षुद्रग्रहों (एस्टेरॉयड) के मलबे को हजम करने वाले तारे पीले रंग के हो जाते हैं। इस अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष के सबसे लाल तारे 'डब्लूडी जे1011प्लस 2845' की भी पहचान की है, जो पृथ्वी से मात्र 48 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है और इसके गहरे संवहन क्षेत्र में कार्बन की उपस्थिति के कारण इसका रंग गहरा गुलाबी दिखाई देता है।


