त्यौहारों पर चीनी की मिठास लेकिन किसान बदहवास,गन्ना किसान की मेहनत पर मुनाफे की मिठास, फिर भी किसान बदहाल क्यों?
“चीनी का बाजार भाव 60–65 रुपये किलो, गन्ने का दाम 400 रुपये क्विंटल; सवाल यह है कि खेती का जोखिम किसान उठाए और मुनाफे का हिसाब दूसरे तय करें?”

के. पी. मलिक, वरिष्ठ पत्रकार
भारत में खेती का संकट केवल फसल की कीमत तक सीमित नहीं है। घटती जोत, बढ़ती लागत, रासायनिक खादों पर निर्भरता, सिंचाई की समस्या, बाजार में बिचौलियों का दबदबा और फसलों के भुगतान में देरी ने किसान की आर्थिक स्थिति को लगातार कमजोर किया है। सवाल यह है कि जब खेती देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है, तो खेती करने वाला किसान ही आर्थिक असुरक्षा का शिकार क्यों है? उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों की स्थिति इस विरोधाभास का बड़ा उदाहरण है। किसान महीनों मेहनत करता है, खाद, बीज, सिंचाई, मजदूरी और कृषि मशीनों पर खर्च करता है। इसके बाद गन्ना चीनी मिल को आपूर्ति करता है, लेकिन भुगतान के लिए उसे बार-बार इंतजार करना पड़ता है। कई किसानों को बकाया राशि हासिल करने के लिए धरना-प्रदर्शन और आंदोलन तक करने पड़ते हैं। यह कैसी व्यवस्था है, जिसमें किसान अपनी उपज दे चुका है, लेकिन अपनी ही कमाई पाने के लिए संघर्ष करने को मजबूर है?
लागत किसान की, जोखिम किसान का, भुगतान के लिए आंदोलन भी किसान का!
गन्ने का भाव यदि 400 रुपये प्रति क्विंटल है और किसान का दावा है कि उत्पादन की लागत भी इसी के आसपास या उससे अधिक बैठती है, तो उसकी वास्तविक कमाई पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि लागत का सही आकलन क्षेत्र, उपज, सिंचाई, मजदूरी और अन्य खर्चों के आधार पर होना चाहिए। लेकिन खेत की लागत के साथ जमीन का किराया, परिवार की मेहनत, कर्ज का ब्याज और भुगतान में देरी से होने वाला नुकसान भी जोड़ें, तो किसान की आर्थिक कठिनाई और स्पष्ट हो जाती है।
दूसरी ओर, बाजार में चीनी 60 से 65 रुपये प्रति किलो बिकने की बात सामने आती है। यहां यह समझना जरूरी है कि एक क्विंटल गन्ने से एक क्विंटल चीनी नहीं बनती। चीनी मिलों को पेराई, बिजली, परिवहन, श्रम और अन्य खर्च भी उठाने पड़ते हैं। शीरा, बगास और अन्य उप-उत्पादों से भी आय होती है। इसलिए केवल चीनी के खुदरा भाव और गन्ने के भाव की तुलना से मिल का वास्तविक मुनाफा तय नहीं किया जा सकता। फिर भी सवाल कायम है कि क्या गन्ने से पैदा होने वाले कुल मूल्य में किसान को उसके श्रम, लागत और जोखिम के अनुरूप हिस्सा मिल रहा है?
सात दिन में भुगतान क्यों नहीं?
उत्तर प्रदेश सरकार को गन्ना भुगतान व्यवस्था पर सख्ती से अमल कराना चाहिए। किसानों की मांग है कि गन्ना आपूर्ति के सात दिन के भीतर भुगतान सुनिश्चित हो। यह मांग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसान की अगली फसल, परिवार का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, बिजली का बिल और कर्ज की किस्तें किसी मिल के भुगतान चक्र के हिसाब से नहीं चलतीं। यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं होता, तो बकाया राशि पर देरी के लिए जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और लागू कानून के अनुसार ब्याज तथा दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। सरकार का काम केवल गन्ने का मूल्य घोषित करना नहीं, बल्कि उस मूल्य का समय पर भुगतान कराना भी है। घोषणा से किसान का घर नहीं चलता; खाते में पैसा आने से चलता है।
खेती को बचाना है तो नीतियों का रुख बदलना होगा
कृषि संकट का स्थायी समाधान केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य या गन्ने का भाव बढ़ाने तक सीमित नहीं हो सकता। घटती जोत को ध्यान में रखकर छोटे किसानों के लिए साझा कृषि मशीनें, सामूहिक खरीद और सहकारी विपणन की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। रासायनिक खादों के असंतुलित इस्तेमाल को कम करने के लिए मिट्टी की जांच, जैविक खाद और प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन देना होगा। प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को संक्रमण काल में आर्थिक सहायता मिले, क्योंकि मिट्टी और उत्पादन व्यवस्था बदलने में समय लगता है।
वर्षा जल संचय, तालाबों का पुनर्जीवन, सूक्ष्म सिंचाई और खेतों के आसपास वृक्षारोपण को कृषि नीति का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए। औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने के साथ उनके प्रसंस्करण, प्रमाणन, भंडारण और विपणन की विश्वसनीय व्यवस्था भी हो। केवल पौधे उगाने की सलाह देना पर्याप्त नहीं, उनकी उपज का खरीदार और उचित बाजार भी उपलब्ध कराना होगा। इसी तरह कृषि आधारित उद्योगों की जरूरत के अनुरूप तकनीकी पाठ्यक्रम तैयार किए जाएं, ताकि ग्रामीण युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल सके। जमाखोरी, मिलावटखोरी और अनुचित व्यापारिक गतिविधियों पर प्रभावी कार्रवाई हो तथा कृषि उपज की कीमतों और बाजार में होने वाले मूल्य-वर्धन की पारदर्शी जानकारी किसानों तक पहुंचे।
किसान को राहत नहीं, उसका अधिकार चाहिए
सरकार को यह स्वीकार करना होगा कि किसान की समस्या केवल उत्पादन बढ़ाने की नहीं, बल्कि उत्पादन से होने वाली आय के न्यायपूर्ण वितरण की भी है। यदि किसान लागत और जोखिम उठाए, लेकिन भुगतान के लिए उसे आंदोलन करना पड़े, तो कृषि व्यवस्था की सफलता के दावों की समीक्षा जरूरी है। उत्तर प्रदेश सरकार को गन्ना भुगतान के लिए सात दिन की समय-सीमा सुनिश्चित करने, बकाया भुगतान की सार्वजनिक निगरानी व्यवस्था बनाने और उल्लंघन पर जिम्मेदारी तय करने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।आखिर सवाल सीधा है कि जब चीनी बाजार में महंगी बिक रही है, तब गन्ना उगाने वाला किसान कर्ज और बकाया भुगतान के बोझ तले क्यों दबा है? खेती को लाभकारी बनाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? किसान को भाषण, आश्वासन और आंदोलन के बाद मिलने वाली राहत नहीं, ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें उसकी मेहनत का उचित मूल्य मिले और उसकी उपज का भुगतान समय पर हो। क्योंकि जिस देश का किसान अपनी कमाई के लिए संघर्ष करता रहे, वहां कृषि की समृद्धि के दावे अधूरे ही रहेंगे।
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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)


