वाशिंगटन। प्रशांत महासागर में आकार ले रहे एक ऐतिहासिक अल नीनो पर अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अर्थ ऑब्जर्विंग सैटेलाइट्स लगातार निगरानी रख रहे हैं। इस संबंध में नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (नोआ) ने चेतावनी जारी करते हुए बताया है कि 1950 के बाद के सबसे ताकतवर अल नीनो बनने की 83 प्रतिशत संभावना है। प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में पानी का तापमान सामान्य से काफी अधिक बढ़ने और हवाओं की दिशा गड़बड़ाने के कारण इस शक्तिशाली मौसमी बदलाव का सीधा असर दुनिया भर के किसानों, तटीय समुदायों और वैश्विक मौसम पर पड़ने लगा है।
केल्विन तरंगों से शुरू हुआ मौसमी बदलाव
इस ऐतिहासिक अल नीनो का पहला सुराग जनवरी 2026 में पश्चिमी प्रशांत महासागर में माइक्रोनेशिया के पास गर्म पानी की हलचल के रूप में मिला, जिसे वैज्ञानिकों ने 'केल्विन वेव' नाम दिया। यह पानी के भीतर हजारों मील लंबी और धीमी गति से चलने वाली तरंगें होती हैं जो पश्चिम से पूर्व की ओर भारी मात्रा में गर्मी का स्थानांतरण करती हैं। इन तरंगों के कारण पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में स्थानीय जलस्तर में 30 से 40 सेंटीमीटर तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि इंडोनेशिया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के आसपास जलस्तर 15 से 20 सेंटीमीटर तक घट गया है।
फाइटोप्लैंकटन में गिरावट से समुद्री जीवन पर संकट
अल नीनो के कारण भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र का पानी हरे से बदलकर नीला हो गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्र का रंग फाइटोप्लैंकटन नामक सूक्ष्म पौधों की वजह से तय होता है, जो पूरी समुद्री खाद्य श्रृंखला का मुख्य आधार हैं। अल नीनो के प्रभाव से व्यापारिक हवाएं कमजोर पड़ने लगती हैं, जिससे गहरे समुद्र का ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर पानी सतह पर नहीं आ पाता। भोजन की इस कमी से फाइटोप्लैंकटन की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है, जिसका सीधा और प्रतिकूल असर समुद्री जीव-जंतुओं के चक्र के साथ-साथ तटीय मछुआरों की आजीविका पर भी पड़ रहा है।


