नई दिल्ली। देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवैधानिक और प्रशासनिक संस्थाओं की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है। एक कार्यक्रम के दौरान विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति और विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सरकारी तथा निजी दोनों क्षेत्रों के संस्थानों का अस्तित्व बनाए रखना और उन्हें निरंतर मजबूत करना आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि वर्तमान संस्थागत ढांचे को और अधिक सशक्त बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए ताकि वे जनहित में सुचारू रूप से कार्य कर सकें।
सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं और अस्पतालों की मजबूती पर जोर
स्वास्थ्य क्षेत्र की प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हुए पूर्व सीजेआई ने कहा कि आम जनता की देखभाल और उनके कल्याण के लिए सरकारी अस्पतालों का योगदान अतुलनीय है। इन चिकित्सा संस्थानों में मुख्य रूप से ऐसे जरूरतमंद लोग पहुंचते हैं, जिन्हें तत्काल और सस्ती स्वास्थ्य सहायता की आवश्यकता होती है। इनमें से एक बड़ी आबादी दूर-दराज और ग्रामीण क्षेत्रों से उम्मीद लेकर आती है। इस पूरी स्थिति को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे को आधुनिक, सक्षम और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में त्वरित और निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर जारी सियासी हलचल का संदर्भ
पूर्व मुख्य न्यायाधीश का यह वक्तव्य ऐसे समय में आया है जब देश में निर्वाचन प्रणाली और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक सरगर्मी बनी हुई है। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग और कथित अनियमितताओं को लेकर विपक्षी दलों द्वारा विभिन्न मंचों पर विरोध दर्ज कराया जा रहा है। संस्थाओं की निष्पक्षता और उनकी स्वायत्तता को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच पूर्व सीजेआई द्वारा संस्थानों को मजबूत करने की बात कहे जाने को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कॉलेजियम की बैठकों से जुड़े आंतरिक मतभेदों का खुलासा
दूसरी ओर, न्यायपालिका के भीतर की कार्यप्रणाली को लेकर एक पूर्व न्यायाधीश द्वारा लिखित पुस्तक में किए गए दावे भी चर्चा के केंद्र में हैं। सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने अपनी आत्मकथा में उल्लेख किया है कि कॉलेजियम की आधिकारिक बैठकों से पहले ही न्यायिक नियुक्तियों से जुड़े नामों पर चर्चा करने की प्रक्रिया को लेकर मतभेद उभर आए थे। उनका मानना था कि औपचारिक विचार-विमर्श से पहले सहमति बनाने की कोशिशों से संस्थागत स्वतंत्रता पर विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका बनी रहती है, जिससे न्यायपालिका की साख प्रभावित हो सकती है।


