
(राष्ट्रीय संगीत नाटक अकादमी से पुरस्कृत वरिष्ठ नाट्य निर्देशक एवं परिकल्पक)
रतन थियम की याद प्रारंभ… अंत से
दिवंगत रंग शिरोमणि रतन थियम को स्मरण करते हुए, मैं इस लेख की शुरुआत उनके अंतिम दृश्य से करना चाहता हूँ—एक ऐसा क्षण, जिसे केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्वभर के रंगकर्मी, समीक्षक और कला-प्रेमी साक्षी बने हैं। जब मंच पर नाटक समाप्त होता, पर्दा गिरता, तो रतन थियम जी मंच पर आते—किसी अभिनेता की तरह नहीं, बल्कि एक साधक की भांति। वे घुटनों के बल बैठकर, नत-मस्तक होकर दर्शकों को प्रणाम करते थे। वह दृश्य मेरे लिए कला की विनम्रता और साधना का शिखर था।
मौन में संवाद रचने वाला ऋषि
मैंने उन्हें मंच पर अपने बारे में कभी बोलते नहीं सुना। शायद इसलिए कि उनका सम्पूर्ण जीवन स्वयं एक जीवंत नाटक था—हर दृश्य, हर मौन, हर संकेत उनके समर्पण की कथा कहता था। मणिपुर की धरती से निकले इस रंगऋषि ने भारतीय रंगमंच को नई भाषा, नई दृष्टि और गहराई दी। उनकी प्रस्तुतियों में शब्दों से अधिक, मौन और प्रकाश बोलते थे। मंच पर कोई हड़बड़ी नहीं होती—बस एक गहन लय, जैसे कोई योगी अपने शिष्यों को मौन उपदेश दे रहा हो।
साधक, निर्देशक नहीं
जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का छात्र था, तब पहली बार उनका नाटक देखा। मुझे अंदाज़ा नहीं था कि रंगमंच ध्यान-साधना जैसा भी हो सकता है। उनके नाटक देखने नहीं, अनुभव करने की प्रक्रिया होती थी। रतन थियम जी सिर्फ निर्देशक नहीं थे—वे एक कलायोगी थे। उनके मंचन में स्वर, ध्वनि, मौन और गति सभी एक आध्यात्मिक एकता में बंधे रहते। नाट्य रूपांतरण उनके लिए केवल प्रस्तुति नहीं, एक आत्मिक अनुष्ठान था।
तकनीकी नहीं, तपस्वी टीम
भारत रंग महोत्सव (BRM) में बतौर टेक्निकल कोऑर्डिनेटर, मुझे कई बार उनके नाटकों के उद्घाटन और समापन में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला। उनका प्रवेश ही जैसे कोई ऊर्जा लेकर आता था। वे मंच के समीप नियत स्थान पर ध्यानस्थ मुद्रा में बैठते, और पूरी टीम—वरिष्ठ से कनिष्ठ तक—उनके चरणों को छूकर आशीर्वाद लेती। पूर्वाभ्यास उनके लिए एक अलग शो जैसा होता—शुद्ध, सटीक, शांत। तकनीकी दल उनके लिए “कर्मचारी” नहीं, बल्कि उस रंगमंच की आत्मा थे।
आज भी उनके ये शब्द मेरे भीतर गूंजते हैं:
“इस धरती की कला तभी जीवित रहेगी, जब हम इस धरती के लोगों को प्राथमिकता देंगे।“
कलाक्षेत्र: मणिपुर की तपोभूमि
मुझे कई बार अवसर मिला ‘कोरस रेपर्टरी’—उनकी संस्थान और साधना-स्थली—जाने का। वहाँ का वातावरण केवल नाट्य-अभ्यास नहीं, बल्कि ध्यान और अनुशासन का तपोवन है। वहाँ कलाकार अभिनय नहीं करते, वे परंपरा का निर्वाह करते हैं जिसमें कला, जीवन और आत्मा एक हो जाते हैं।
रंगमंच का ‘जादुई पिटारा’
रतन थियम का मंच एक जादुई पिटारा था। वह साधारण दिखता था, पर भीतर समाए थे सभ्यताओं के संकेत, आत्मा की पुकार, और मिथकीय छवियाँ।
चाँद और सूरज उनके रंगमंच के दो ध्रुव थे—चाँद विचार, सूरज क्रिया।
उनके मंच से कभी निकलते थे पहाड़, कभी नदियाँ। कभी युद्ध के दृश्य, तो कभी सत्ता की पालकियाँ।
उनका मंच एक धरोहर की भूमि था — जहाँ दृश्य नहीं, संवेदनाएँ प्रवाहित होती थीं।
तपस्थली बनता मंच
जब तीसरी घंटी बजती, और मंच सांस लेने लगता, तब उनका पिटारा खुलता।
और मंच पर उतरता एक ब्रह्मांड — जिसमें मंत्र, ध्वनि, प्रकाश, चुप्पी और चेतना का समावेश होता।
यह रंगमंच मनोरंजन नहीं, एक अनुष्ठान था।
यहाँ बारिश बिना बादलों के होती, और इंद्रधनुष बिना बूंदों के उगते।
हाथी मंच पर बैठ जाता — कुछ नहीं कहता — पर दर्शक के मन में कुछ छोड़ जाता:
एक मौन,
एक स्मृति,
एक सवाल।
अंत नहीं, उत्तराधिकार
जब अंतिम दृश्य होता, पर्दा गिरता, तो वह फिर से घुटनों पर बैठते —
हाथ जोड़कर मौन में शीश नवाते।
वह अभिमान नहीं, आभार था।
और फिर वे चुपचाप अपने उत्तर-पूर्व की ओर लौट जाते —
मगर इस बार,
अपना जादुई पिटारा वहीं छोड़ जाते हैं।
समापन: दीपक अब भी जल रहा है
आज जब मंच चकाचौंध और शोरगुल से भर गया है,
जब कला बाज़ार में जल्दबाज़ी से बिक रही है,
तब भी
रतन थियम का रंगमंच
एक मौन दीपक है —
जो धीरे-धीरे,
भीतर तक उजाला करता है।
वे निर्देशक नहीं,
ऋषि थे —
जिन्होंने संवाद नहीं,
साधना से बात की है।
आज उनका जादुई पिटारा
मंच के किनारे रखा है —
किसी अगले साधक के लिए,
किसी नए जादूगर के लिए —
जो उसे फिर से खोले,
और नई सृष्टि रचे।
श्रद्धांजलि नहीं, साधना की वसीयत है यह लेख
यह लेख मेरे लिए केवल एक कलात्मक स्मरण नहीं —
यह उस साधना की झलक है,
जिसने मेरी रंगदृष्टि को आकार दिया है।
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