More
    Homeराज्यमध्यप्रदेशनर्मदापुरम में तांत्रिकों जमघट, 200 साल पुराने मढ़ई मेले में तंत्र साधना,...

    नर्मदापुरम में तांत्रिकों जमघट, 200 साल पुराने मढ़ई मेले में तंत्र साधना, पैदल चली मिट्टी की मूर्ति

    नर्मदापुरम: दीपावली के बाद भाई दूज पर सोहागपुर तहसील में अद्भुत मेला लगता है. यहां पर दूर-दराज के अलग-अलग स्थानों से तांत्रिकों का जमावड़ा लगता है. इस मेले में करीब 200 तांत्रिक एकत्रित होते हैं, जो तंत्र की देवी गांगो की परिक्रमा कर लोगों की खुशहाली की दुआ मांगते हैं. यहां तांत्रिक अपने अपने निशान के रूप में मोर पंख की ढाल लेकर आए थे. सभी ढालों को पारंपरिक तरीके से सजाकर गांगो देवी के पास लाकर उनकी पूजा की गई. इसके अलावे आदिवासी गीत संगीत नृत्य का दौर भी चलता रहा.

    200 सालों से जुट रहे तांत्रिक

    मढ़ई मेले के रूप में पहचान रखने वाला यह मेला आदिवासी वर्ग के लोगों की आस्था का विशेष केंद्र है. यहां आदिवासी वर्ग के लोग बड़ी संख्या में आकर अपनी समस्याओं का समाधान तांत्रिकों के माध्यम से करते हैं. सोहागपुर के सुखराम कोरी अपने पूर्वजों द्वारा शुरू किए गए मढ़ई मेले की 200 वर्ष पुरानी परंपरा को याद करते हुए कहते हैं कि "हम आज भी उसी परंपरा को बनाए हुए हैं, जो हमारे पूर्वजों ने लोगों की विभिन्न समस्याओं का समाधान करने के लिए शुरू की थी."

     

    यहां भी लगाता है तांत्रिक मेला

    यहां आने वाले लोगों का मानना है कि "तंत्र-मंत्र से जुड़ी जो भी परेशानी होती है उसका समाधान यहां आकर हो जाता है. सोहागपुर के अलावा अलग-अलग तिथियों में बनखेड़ी, पिपरिया सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में भी मढ़ई मेला लगता है. लेकिन सोहागपुर का मेला क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है. इस मेले की खास बात यह है कि यहां आसपास से बड़ी संख्या में तांत्रिक अपनी तंत्र विधा की देवी की पूजा करने और उसकी परिक्रमा करने पहुंचे हैं.

    तांत्रिकों ने की तंत्र साधना

    यहां तांत्रिकों को स्थानीय भाषा में पडियार कहा जाता है. नर्मदापुरम के आदिवासी अंचल और खासकर जंगलों के आसपास बसे ग्रामीण क्षेत्रों में तंत्र विधा को जानने वालों की संख्या काफी है. जिसके चलते ये सभी आदिवासी तांत्रिक इस मेले में शामिल होकर देवी के सामने आकर अराधना करते हैं. अपने अपने निशान के रूप में ढाल लेकर आते हैं, जिसे एक बांस में मोर पंखों को सजा कर बनाया जाता है.

    यह है तांत्रिक मेले की पौराणिक कहानी

    पूर्व नगर परिषद अध्यक्ष संतोष मालवीय ने कहा कि सोहागपुर क्षेत्र में कविंदतियां प्रचलित हैं कि "भगवान शिव के गण भीलट देव और तंत्र की देवी गांगो दोनों तंत्र विधा में माहिर थे. एक समय दोनों आपस में ही अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने लगे, जिसमें तंत्र की देवी गांगो ने भीलट देव को तंत्र विधा के दम पर बैल बना दिया. शिव जी ने दोनों को आपस में लड़ता देख समझाया और कहा कि तुम दोनों भाई बहन हो, आपस में लड़ना बंद करो.

    भगवान शिव ने गांगो को आर्शीवाद देकर कहा कि आज से सभी तंत्र के देवता और गण भाई दूज के दिन तुम्हारी पूजा करके परिक्रमा करेंगे. तभी से तंत्र के जानने वाले पडियार गांगो माता की पूजा करते हैं. तांत्रिकों के मेले में जितने भी तांत्रिक यानि पडियार शामिल होते हैं, वे अपनी निशानी लेकर जरूर आते हैं."

    भीलट देव के निशान के बाद होती है पूजा

    इस मेले में तंत्र की देवी की पूजा और परिक्रमा तब तक शुरू नहीं होती है, जब तक भीलट देव का निशान वहां नहीं आ जाता. भीलट देव का निशान एक बांस में लोटा बांधकर बनाया जाता है और बाकी तांत्रिक गण अपने निशान बांस में मोर पंख बांधकर बनाते हैं. ग्रामवासी विवेक ने बताया कि "हमारे पूर्वजों ने इस देवी की प्रतिमा को शोभापुर के राजा से जीता था, जिसे सुखराम के पूर्वज मिट्टी की प्रतिमा को पैदल चला कर अपने तंत्र शक्ति के बल पर लाए थे."

      latest articles

      explore more

      LEAVE A REPLY

      Please enter your comment!
      Please enter your name here