More
    Homeदेशपत्नी ने लोन का पैसा नहीं चुकाया तो बैंक ने पति की...

    पत्नी ने लोन का पैसा नहीं चुकाया तो बैंक ने पति की पेंशन काट ली, लौटाने होंगे 5 लाख रुपये

    डेस्क: क्या बैंक (Bank) अपनी मर्ज़ी से किसी के खाते से पैसे काट सकता है? ख़ासकर तब, जब उस खाते में पेंशन (Pension) का पैसा जमा हो? ओडिशा हाईकोर्ट (Odisha High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में इस सवाल का जवाब दिया है, जो देश के लाखों बुजुर्गों और पेंशनभोगियों के लिए किसी बड़ी राहत से कम नहीं है. हाईकोर्ट ने साफ़ कह दिया है कि बैंक, लोन डिफ़ॉल्ट होने पर भी, गारंटर के पेंशन फंड को सीधे-सीधे जब्त नहीं कर सकता. यह पूरा मामला मल्लिक नामक एक रिटायर व्यक्ति से जुड़ा है. मल्लिक साहब, जो रेल कोच फैक्ट्री से रिटायर हुए थे, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) में अपनी पत्नी के साथ एक संयुक्त खाता (Joint Account) रखते थे. इसी खाते में उनकी करीब ₹35,000 की मासिक पेंशन आती थी. मल्लिक साहब अपनी पत्नी के दो ट्रांसपोर्ट व्हीकल लोन के गारंटर बने थे.

    मल्लिक साहब की पत्नी ने 5.9 लाख और 8 लाख रुपये के दो वाहन लोन लिए थे. कुछ समय बाद, वह इन कर्ज़ों की किश्तें नहीं चुका पाईं और नवंबर 2018 में दोनों खाते एनपीए (NPA) घोषित हो गए. बैंक ने लोन की वसूली के लिए कई बार नोटिस भेजा, लेकिन बात नहीं बनी. इसके बाद, बैंक ने एक ऐसा कदम उठाया, जिसने मल्लिक साहब की पूरी जमा पूंजी पर संकट ला दिया. 17 और 19 फरवरी 2024 को, बैंक ने बिना किसी पूर्व सूचना या सहमति के, मल्लिक साहब के संयुक्त खाते से कुल 5 लाख रुपये काट लिए. बैंक का दावा था कि यह राशि लोन के बकाए को निपटाने के लिए ली गई है. मल्लिक साहब ने तर्क दिया कि वह तो केवल गारंटर थे, न कि मुख्य उधारकर्ता. उन्होंने बैंक को एक निवेदन भी दिया कि उन्हें बेटी की शादी के लिए पैसों की सख़्त ज़रूरत है, इसलिए राशि वापस की जाए, लेकिन बैंक ने कोई ध्यान नहीं दिया. मजबूरन, उन्होंने न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.

    जस्टिस (डॉ.) संजीव के पाणिग्रही की पीठ ने 17 अक्टूबर 2025 को इस याचिका पर सुनवाई करते हुए एक ऐतिहासिक फ़ैसला दिया. कोर्ट ने कहा कि यह मामला केवल एक बैंकिंग विवाद नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवनयापन के अधिकार से जुड़ा है. कोर्ट ने साफ कहा कि पेंशन कोई भीख या खैरात नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी की मेहनत से कमाई गई संपत्ति है, जो उसे बुढ़ापे में सम्मान से जीने का अधिकार देती है. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए बताया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 60(1)(g) के तहत, सरकारी पेंशन को किसी भी तरह की कुर्की (Attachment) से कानूनी सुरक्षा मिली हुई है. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया, “जो काम कानून किसी औपचारिक आदेश के बिना नहीं करने देता, उसे बैंक अपनी मर्ज़ी से, पेंशन फंड को काटकर, अप्रत्यक्ष रूप से नहीं कर सकता.”

    बैंक ने दलील दी थी कि मल्लिक साहब गारंटर थे और खाता भी ज्वाइंट था, इसलिए वसूली सही थी. लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को ख़ारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि भले ही एक गारंटर की ज़िम्मेदारी मुख्य उधारकर्ता के बराबर होती है, लेकिन वसूली का तरीका कानूनी और उचित होना चाहिए. किसी एक व्यक्ति के कर्ज़ के लिए, बैंक दूसरे सह-खाताधारक (Co-account Holder) के खाते से ऐसे ही पैसे नहीं निकाल सकता. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चूंकि मल्लिक साहब की पेंशन इस खाते में आती थी, इसलिए सिर्फ ज्वाइंट खाता होने के कारण, फंड्स अपनी पेंशन वाली सुरक्षा नहीं खो सकते. बैंक की यह कार्रवाई पूरी तरह से एकतरफ़ा थी और प्राकृतिक न्याय के बुनियादी नियमों का उल्लंघन करती है, क्योंकि मल्लिक साहब को कोई नोटिस नहीं दिया गया.

    अपने फ़ैसले में, हाईकोर्ट ने एसबीआई के 5 लाख रुपये काटने की कार्रवाई को “अवैध और क़ानून में अस्थिर” घोषित कर दिया. कोर्ट ने बैंक को आदेश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर मल्लिक साहब के खाते में पूरी ₹5,00,000 की राशि वापस जमा करे. हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि इस फ़ैसले से बैंक का लोन वसूलने का अधिकार ख़त्म नहीं होता. बैंक पूरी तरह से स्वतंत्र है कि वह कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए, जैसे कि सिक्योरिटी को लागू करना या उचित न्यायाधिकरण में मामला दर्ज करना, अपनी बकाया राशि वसूल करे. मगर, बैंक किसी भी स्थिति में, पेंशनभोगी की जीवन-यापन के साधन (Pensioner’s means of sustenance) यानी पेंशन को सीधे जब्त नहीं कर सकता.

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here