शालीभद्र जी मसा ने मुनि बनने से पहले 50 देशों के व्यापार और हजारों करोड़ की संपत्ति त्याग की थी
मिशनसच न्यूज, अलवर/बालोतरा। जैन समाज के परम पूज्य संत, अनन्य तपस्वी और ज्ञान गच्छाधिपति पूज्य गुरुदेव प्रकाशचंद्र जी मसा के आज्ञानुवर्ती पूज्य शालीभद्र जी मसा का गत रात्रि शांतिपूर्वक देवलोकगमन हो गया। उनका संपूर्ण जीवन त्याग, तप, वैराग्य और संयम की एक ऐसी उज्ज्वल धारा रही जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।
पूज्य श्री शालीभद्र जी का जन्म 12 अक्टूबर 1947 को अलवर के प्रतिष्ठित संचेती परिवार में हुआ। पिता रतनचंद जी संचेती और माता श्रीमती चम्पादेवी जी के घर जन्मे आप पाँच बहनों के इकलौते भाई थे। आपका सांसारिक नाम प्रकाश संचेती था। बचपन से ही तेजस्वी, गंभीर और कर्मठ स्वभाव के धनी रहे और आगे चलकर आपने व्यापार जगत में अपनी अलग पहचान बनाई।
व्यवसायिक उत्कर्ष और विश्वव्यापी पहचान
युवा अवस्था में बड़े सपनों के साथ आप अलवर से जयपुर पहुँचे और रत्न–आभूषण के व्यवसाय की शुरुआत की। कुछ ही वर्षों में आपकी मेहनत और प्रतिभा ने आपको देश ही नहीं, विदेशों तक एक जाना माना नाम बना दिया। आपका व्यापार 50 से अधिक देशों में फैला, और जयपुर सहित भारत के प्रमुख ज्वेलरी बाजारों में आपका विशिष्ट स्थान बन गया। आपका जीवन अत्यंत वैभवपूर्ण था—आलीशान बंगले, महंगी विदेशी कारें, विदेशों में महीनों का प्रवास, और राजसी ठाठ–बाट से परिपूर्ण जीवनशैली। विवाह दिल्ली निवासी श्रीमती शशि जी से हुआ और जीवन सफलता और सम्पन्नता की ऊँचाइयों पर पहुँच चुका था।
वैराग्य की ज्वाला—माता के एक वचन से बदला जीवन
सन 1982 में एक घटना ने आपके जीवन की पूरी दिशा बदल दी जब आपकी पूज्य माता श्रीमती चम्पादेवी ने कहा—“पुत्र, और कितना कमाना है? अब कुछ धर्म कमाई भी करो। साथ तो धर्म ही जाना है, धन-दौलत नहीं।” इन सरल किन्तु गहन वचनों ने आपके भीतर वैराग्य की ऐसी लौ जलाई कि राजसी जीवन तुच्छ लगने लगा। आपने धीरे–धीरे व्यवसाय सीमित किया और पति–पत्नी दोनों ने सजोड़े सहित आजीवन ब्रह्मचर्य धारण कर लिया। इसी समय आपको पूज्य जयंतीलाल जी मसा का सान्निध्य मिला, जिनके उपदेशों और वैराग्यपूर्ण वचनों ने आपको संयम मार्ग की ओर अग्रसर कर दिया।
दीक्षा का संकल्प और अद्भुत परिवर्तन
वैराग्य इतना दृढ़ हुआ कि आप दोनों जयपुर से पैदल किशनगढ़ पहुँचे और ज्ञान गच्छाधिपति पूज्य श्री चम्पालाल जी मसा के समक्ष दीक्षा की प्रार्थना रखी। 12 वर्षों तक ब्रह्मचर्य और त्यागपूर्वक जीवन व्यतीत करने के बाद 8 सितंबर 1994 को जयपुर में अत्यंत सादगीपूर्ण दीक्षा सम्पन्न हुई। प्रकाश संचेती अब मुनि श्री शालीभद्र जी मसा बने और आपकी धर्मपत्नी मुनि श्री शशि प्रभा जी मसा के रूप में संयम जीवन में प्रवेश कर गईं।
कठोर साधना और तप की अखंड साधना
दीक्षा के पश्चात आपका जीवन अद्वितीय तप और संयम से भरा रहा। तेले-तेले पारणा, पारणा में आयंबिल, सुखी रोटी को पानी में भिगोकर केवल घुले अंश का ग्रहण, भारी गर्मी में सूर्य की आतापन साधना, सर्दियों में निर्वस्त्र अवस्था में तप, रात्रिभर कयोत्सर्ग और ध्यान—यह सब आपकी दिनचर्या बन गया। अधिकांश समय मौन धारण कर आपने आत्मशुद्धि की साधना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। आपके तप से प्रभावित होकर आपकी माता श्रीमती चम्पादेवी ने भी 2 मार्च 2006 को दीक्षा लेकर सलेखना–संथारा पच्छक लिया और 24 दिवसीय संथारा साधना से समाधिमरण को प्राप्त हुईं।
धर्म में अद्भुत त्याग—36,000 करोड़ के वैभव का परित्याग
आपका वैराग्य आधुनिक इतिहास का अनुपम उदाहरण है। 80 के दशक में आपकी संपत्ति का मूल्य लगभग 1500 करोड़ आँका गया था, जो आज के समय में लगभग 36,000 करोड़ के समतुल्य है। इतना विशाल वैभव त्यागकर संयम, ब्रह्मचर्य, तप और सेवा का मार्ग चुनना इस युग में अत्यंत दुर्लभ और प्रेरक है।
बालोतरा में प्रवास और निरंतर साधना
सन् 2018 से आप बालोतरा में ही विराजमान रहे और वहीं निरंतर तप, ध्यान, कयोत्सर्ग और मौन की साधना में लीन रहे। ज्ञान गच्छाधिपति पूज्य गुरुदेव श्री प्रकाशचंद्र जी मसा भी इसी अवधि में बालोतरा में विराजमान रहे, जिससे यह स्थान आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बन गया।
संथारा साधना और देवलोकगमन
5 नवंबर 2025 से आपने संथारा साधना आरंभ की थी। आपकी साधना के विषय में सुनकर देशभर से श्रावक–श्राविकाओं का सैलाब बालोतरा पहुँचने लगा। 14वीं साधना तिथि पर, 20 नवंबर की पावन रात्रि में, आप शांत चित्त और पूर्ण समाधि अवस्था में देवलोकगमन को प्राप्त हुए। आपका जीवन सिद्ध करता है कि इस पंचम काल में भी उच्चतम संयम, अतुलनीय तप और अनन्य ब्रह्मचर्य का पालन संभव है।
श्रद्धांजलि
पूज्य श्री शालीभद्र जी मसा का जीवन जैन समाज के लिए एक अमूल्य धरोहर है—त्याग का प्रकाश, तप की शक्ति, संयम का आदर्श और वैराग्य का तेजस्वी उदाहरण। उनके पावन चरणों में कोटि–कोटि वंदन।
जिन शासन का यह उज्ज्वल दीपक सदैव स्मरण रहेगा।
— श्री सुधर्म जैन श्रावक संघ द्वारा विनम्र श्रद्धांजलि
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