फर्जी एफिडेविट से फौजी का जनआधार से हटाया गया नाम, परिवार सरकारी योजनाओं से वंचित
मनीष मिश्रा,मिशनसच न्यूज खैरथल। सरकारी तंत्र की गंभीर खामियों और पारिवारिक साजिश का एक चौंकाने वाला मामला खैरथल जिले से सामने आया है, जहां देश की सीमाओं की रक्षा में तैनात एक फौजी को कागज़ों में मृत घोषित कर दिया गया। हैरानी की बात यह है कि जिस जवान को सरकारी रिकॉर्ड में मृत दिखाया गया, वह पिछले 12 वर्षों से पूरी तरह जीवित है और लगातार देश सेवा में ड्यूटी निभा रहा है।
खैरथल जिले के निकटवर्ती गांव सिवाना निवासी महेंद्र, वर्ष 2013 से आईटीबीपी (Indo-Tibetan Border Police) में सेवाएं दे रहे हैं। आरोप है कि करीब एक वर्ष पूर्व उनके ही परिजनों ने फर्जी एफिडेविट तैयार कर महेंद्र को मृत घोषित करवा दिया। इसी फर्जी दस्तावेज के आधार पर महेंद्र और उनकी पत्नी सोनम का नाम परिवार के मूल दस्तावेज जनआधार कार्ड से हटवा दिया गया।


ड्यूटी पर तैनात रहते हुए घोषित कर दिया मृत
सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिस समय महेंद्र को सरकारी रिकॉर्ड में मृत दिखाया गया, उस दौरान वे पूरी तरह सक्रिय सेवा में थे। वर्तमान में वे जाटूसाना, रेवाड़ी स्थित आईटीबीपी बटालियन में कार्यरत हैं। बावजूद इसके, संबंधित विभागों ने बिना किसी ठोस सत्यापन के एफिडेविट को मान्य कर लिया।
जनआधार से नाम हटते ही परिवार पर टूटा संकट
जनआधार से नाम हटने के बाद महेंद्र, उनकी पत्नी और बच्चों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। राजस्थान सरकार की अधिकांश कल्याणकारी योजनाएं जनआधार से जुड़ी होने के कारण परिवार सभी सरकारी सुविधाओं से वंचित हो गया है।
परिवार को न तो राशन जैसी मूल सुविधाएं मिल पा रही हैं और न ही बच्चों के लिए मूल निवास प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र सहित अन्य आवश्यक दस्तावेज बन पा रहे हैं। सरकारी पहचान से बाहर कर दिया जाना परिवार के लिए सामाजिक और प्रशासनिक संकट बन गया है।
नाम जोड़ने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं
मामले की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जनआधार प्रणाली में एक बार नाम हट जाने के बाद उसे दोबारा जोड़ने का कोई स्पष्ट और सरल प्रावधान नहीं है। इसी कारण देश की सुरक्षा में तैनात जवान आज सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर है।
जांच और सख्त कार्रवाई की मांग
पीड़ित फौजी महेंद्र ने जिला प्रशासन और संबंधित विभागों से मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उन्होंने फर्जी एफिडेविट तैयार कराने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने और जनआधार में उनका तथा उनके परिवार का नाम पुनः जोड़ने के लिए विशेष राहत देने की अपील की है।
सरकारी तंत्र पर उठे सवाल
यह मामला केवल एक फौजी की व्यक्तिगत पीड़ा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनआधार जैसी महत्वपूर्ण सरकारी योजना की विश्वसनीयता और सत्यापन प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। जब सीमा पर तैनात जवान की पहचान सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
यह प्रकरण प्रशासन और सरकार के लिए एक चेतावनी है कि डिजिटल योजनाओं में मानवीय सत्यापन और जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना ऐसी त्रुटियां देश सेवा कर रहे जवानों और उनके परिवारों को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं।
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