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    काबुल पर हमले जायज हैं तो भारतीय हमले गलत कैसे हो गए: मौलाना फजलुर रहमान

    इस्लामाबाद।पाकिस्तान की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा भूचाल आया हुआ है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फजल) के अध्यक्ष मौलाना फजलुर रहमान द्वारा अपनी ही सेना और सरकार के खिलाफ दिए गए कड़े बयानों ने शहबाज शरीफ सरकार और सेना प्रमुख आसिम मुनीर को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। कराची के ल्यारी में आयोजित एक जनसभा में मौलाना फजलुर रहमान ने सीधे तौर पर पाकिस्तान की सैन्य रणनीति और अफगानिस्तान के प्रति उसके दृष्टिकोण पर तीखे सवाल पूछे हैं। उनके इन सवालों ने न केवल देश के भीतर सनसनी फैला दी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की स्थिति को और अधिक असहज कर दिया है।मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तानी जनरलों और हुक्मरानों से दो टूक पूछा कि यदि पाकिस्तान काबुल पर अपने हमलों को जायज मानता है, तो वह भारत द्वारा मुरीदके और बहावलपुर पर की गई स्ट्राइक को गलत कैसे ठहरा सकता है।
    उन्होंने कहा कि अगर एक देश दूसरे देश की संप्रभुता का उल्लंघन कर हमला करता है, तो उसे दूसरों पर उंगली उठाने का नैतिक अधिकार नहीं रह जाता। उल्लेखनीय है कि भारत ने मई 2025 में पहलगाम हमले का जवाब देने के लिए पाकिस्तान के भीतर मुरीदके और बहावलपुर जैसे आतंकी अड्डों को निशाना बनाया था। मौलाना के इस बयान ने पाकिस्तान के उस पुराने विमर्श को हिलाकर रख दिया है, जिसमें वह हमेशा खुद को पीड़ित दिखाता आया है। मौलाना के इन तीखे हमलों के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ को सफाई देने के लिए सामने आना पड़ा। उन्होंने मौलाना फजलुर रहमान की तुलना को गलत और अनुचित करार देते हुए कहा कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के खिलाफ इस्लामाबाद की कार्रवाई और भारत द्वारा किया गया हमला एक समान नहीं हैं। रक्षा मंत्री ने दावा किया कि पाकिस्तान अपनी संप्रभुता की रक्षा कर रहा है, जबकि भारत की कार्रवाई उकसावे वाली और अवैध थी। हालांकि, ख्वाजा आसिफ उन ठोस सबूतों पर चुप्पी साध गए जो पहलगाम के आतंकियों के पास से मिले थे और न ही उनके पास अफगानिस्तान में हुई उस एयर स्ट्राइक का कोई जवाब था, जिसमें मासूम बच्चों की जान गई थी। अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान के बिगड़ते रिश्तों पर भी मौलाना ने सरकार को आईना दिखाया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान एक ऐसा अफगानिस्तान चाहता है जो उसके पक्ष में हो, लेकिन इतिहास गवाह है कि जाहिर शाह से लेकर अशरफ गनी तक, काबुल की सरकारें हमेशा भारत के करीब रही हैं। वर्तमान में पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच तनाव चरम पर है। पाकिस्तान का आरोप है कि उसकी धरती पर होने वाले हमलों के लिए अफगान जमीन का इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि काबुल इन आरोपों को सिरे से खारिज करता है। दोनों देशों के बीच शांति वार्ता के कई दौर विफल रहे हैं और सीमा पर झड़पें एक आम बात हो गई हैं। मौलाना फजलुर रहमान के इस साहसपूर्ण रुख ने पाकिस्तान के भीतर उस बहस को जन्म दे दिया है, जिसे दबाने की कोशिश सेना और सरकार लंबे समय से करती आ रही थी।

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