स्मृति शेष – राजेश रवि
अंतिम संस्कार बुधवार 14 जनवरी को सुबह 10 बजे होगा। अंतिम यात्रा उनके निवास वंडर माल के पास कंपनी बाग रोड से तीजकी श्मशान के लिए रवाना होगी।
दुनिया में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ घटती हैं, जिन पर सहज विश्वास करना कठिन होता है। लेकिन जब विज्ञान और चिकित्सा किसी घटना को सत्य सिद्ध कर दें, तब व्यक्ति चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, उसे उस सच्चाई को स्वीकार करना ही पड़ता है। ऐसी ही एक हृदयविदारक और अविश्वसनीय घटना है हमारे मित्र विष्णु बेनीवाल का असामयिक निधन।
सोमवार की रात करीब सवा आठ बजे मेरी उनसे मोबाइल पर बात हुई थी। किसी पुस्तक के सिलसिले में। बातचीत बिल्कुल सामान्य थी। कहीं से भी यह आभास नहीं हुआ कि कुछ ही घंटों बाद यह संवाद मेरी अंतिम बातचीत बन जाएगा।
सुबह उनके स्टाफ के साथी नवीन जी का संदेश आया कि विष्णु जी अब इस दुनिया में नहीं रहे। यह सूचना मेरे मन और मस्तिष्क को इस कदर झकझोर गई कि शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ, लेकिन दुर्भाग्य से यह कड़वा सच था।
दशकों पुराना रिश्ता
विष्णु जी से मेरा रिश्ता दशकों पुराना था। मुझे आज भी याद है वर्ष 1996, जब अलवर जिले में मात्र दो दिनों में 596 मिमी बारिश हुई थी। उस भयानक बाढ़ ने अलवर से भरतपुर तक हजारों परिवारों को संकट में डाल दिया था। उस समय मैंने और मेरे साथी जिनेश जैन ने उस आपदा और उसमें सहयोग करने वालों पर आधारित एक पुस्तक ‘बाढ़’ लिखी थी। उस पुस्तक की छपाई का दायित्व मैंने विष्णु जी को ही सौंपा था। वे तब भी भारत प्रिंटिंग प्रेस के संचालक थे। वहीं से हमारे पेशेवर संबंधों की शुरुआत हुई, जो समय के साथ आत्मीय रिश्ते में बदलते चले गए।
पेशेवर रिश्ता, जो परिवार बन गया
बाद के वर्षों में अनेक पुस्तकों और अन्य कार्यों के माध्यम से उनसे निरंतर संपर्क बना रहा। रिश्ते को और मजबूती तब मिली, जब मैं दैनिक भास्कर, अलवर में संपादक था और विष्णु जी के भतीजे रोबिन बेनीवाल ने मेरे साथ रिपोर्टर के रूप में कार्य प्रारंभ किया। इसके बाद यह संबंध केवल प्रोफेशनल नहीं रहा, बल्कि पारिवारिक बन गया। पिछले एक दशक में उनके परिवार में हुए लगभग सभी विवाह समारोहों में उनसे मुलाकात और संवाद होता रहा।
1 मई 2025 को जब मैंने दैनिक भास्कर छोड़ा, तो पुस्तकों के लेखन कार्य में तेजी आई। इस पूरे दौर में मेरी सभी पुस्तकों की छपाई विष्णु जी का संस्थान ही कर रहे है। मात्र आठ महीनों के भीतर वे मेरी चौथी पुस्तक छाप रहे थे। सोमवार को दिन में उनसे एक बार बात हुई थी और फिर रात करीब सवा आठ बजे भी पुस्तक के सिलसिले में चर्चा हुई। और अगली सुबह यह दुखद समाचार…
“छोटे से बड़ा काम” – विष्णु बेनीवाल
विष्णु बेनीवाल भारत प्रिंटिंग प्रेस के प्रमुख संचालक थे, लेकिन उनके व्यवहार को देखकर कभी यह महसूस नहीं होता था कि वे इतने बड़े संस्थान के मालिक हैं। यदि कार्यालय में सफाई न हो, तो वे स्वयं झाड़ू उठा लेते थे। किसी ग्राहक की शिकायत हो, तो इस सहजता से समाधान करते कि सामने वाला संतुष्ट होकर लौटे। अधिकारियों, राजनेताओं और ग्राहकों किसी को भी वे कभी नाराज़ नहीं करते थे।
परिवार के प्रति उनकी जिम्मेदारी अनुकरणीय थी। एक ही दिन में कार्यालय संभालना, बाहर के दौरे करना और फिर समय पर सभी कार्य पूरे कर देना । यह कला यदि किसी से सीखनी हो, तो वह विष्णु जी ही थे।
एक अपूरणीय क्षति
उनका इस तरह अचानक चले जाना न केवल उनके परिवार और परिचितों के लिए अपूरणीय क्षति है, बल्कि मेरे लिए यह एक व्यक्तिगत नुकसान भी है। हमारा रिश्ता प्रोफेशनल से कहीं आगे बढ़कर पारिवारिक विश्वास में बदल चुका था। आज मैंने अपने परिवार का एक सच्चा मित्र खो दिया है।
प्रिय विष्णु जी, आपकी उम्र अभी हमें छोड़कर जाने की नहीं थी। लेकिन जब डॉक्टरों ने इस सच्चाई पर मुहर लगा दी, तो हम सब असहाय रह गए। ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि वे आपको अपने चरणों में स्थान दें और परिवार को इस अपार दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।
मिशनसच की पूरी टीम विजय यादव, प्रेम पाठक, प्रदीप पंचोली, शोएब खान की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि ।


