मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जीवन और उनके महान चरित्र के निर्माण में उनके गुरुओं का विशेष योगदान रहा है. वैसे तो श्री राम ने अपने जीवन में कई ऋषियों से ज्ञान प्राप्त किया, लेकिन उनके मुख्य रूप से दो प्रमुख गुरु माने जाते हैं महर्षि वशिष्ठ और महर्षि विश्वामित्र. इन दोनों गुरुओं का भगवान राम के जीवन में एक खास और बहुत महत्वपूर्ण स्थान था…
1. कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ (आध्यात्मिक और राजधर्म के गुरु)
महर्षि वशिष्ठ अयोध्या के रघुवंश के कुलगुरु थे. राजा दशरथ के चारों पुत्रों राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का नामकरण और प्रारंभिक शिक्षा वशिष्ठ जी के आश्रम में ही संपन्न हुई थी.
वेद-वेदांग की शिक्षा: वशिष्ठ जी ने श्री राम को वेदों, उपनिषदों, राजनीति और शास्त्रों का गूढ़ ज्ञान दिया.
योग वशिष्ठ: जब युवावस्था में श्री राम के मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ और वे संसार की नश्वरता को लेकर चिंतित हुए, तब गुरु वशिष्ठ ने उन्हें जो उपदेश दिया, वह आज ‘योग वशिष्ठ’ के नाम से प्रसिद्ध है. यह ग्रंथ अध्यात्म का सर्वोच्च शिखर माना जाता है.
राजधर्म: उन्होंने ही राम को एक आदर्श राजा (रामराज्य) के कर्तव्यों के बारे में सिखाया.
2. महर्षि विश्वामित्र (अस्त्र-शस्त्र और कर्म के गुरु)
महर्षि विश्वामित्र श्री राम के जीवन में तब आए जब उन्हें अपनी असुरक्षा और यज्ञों की रक्षा के लिए एक योद्धा की आवश्यकता थी.
दिव्य अस्त्रों का ज्ञान: विश्वामित्र जी राम और लक्ष्मण को अपने साथ वन ले गए. वहां उन्होंने राम को ‘बला’ और ‘अतिबला’ नाम की विद्याएं सिखाईं, जिससे उन्हें कभी थकान या भूख-प्यास नहीं लगती थी। उन्होंने राम को कई दिव्य और संहारक अस्त्र प्रदान किए.
ताड़का और सुबाहु वध: विश्वामित्र के मार्गदर्शन में ही श्री राम ने अपने प्रथम युद्ध कौशल का परिचय देते हुए ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षसों का वध किया.
अहिल्या उद्धार और सीता स्वयंवर: महर्षि विश्वामित्र ही राम को जनकपुर ले गए थे, जहाँ राम ने उनके आदेश पर शिव धनुष तोड़ा और माता सीता से विवाह किया.
गुरु-शिष्य परंपरा का आदर्श
श्री राम ने हमेशा अपने गुरुओं के प्रति अगाध श्रद्धा दिखाई। चाहे वह वशिष्ठ जी के चरणों की सेवा हो या विश्वामित्र के आदेश पर वन जाना, राम ने सिद्ध किया कि एक महान शिष्य वही है जो गुरु की आज्ञा को सर्वोपरि माने.
अन्य गुरु और मार्गदर्शक
वनवास के दौरान भी श्री राम ने कई ऋषियों से मार्गदर्शन प्राप्त किया-
महर्षि भारद्वाज: जिन्होंने उन्हें चित्रकूट में निवास करने की सलाह दी.
महर्षि अगस्त्य: जिन्होंने राम को रावण वध के लिए ‘अमोघ अस्त्र’ और ‘आदित्य हृदय स्तोत्र’ का ज्ञान दिया.


