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    स्मृति शेष : न नेता न अफसर , जनता सबसे ऊपर, ऐसे थे हेमसिंह भडाना

    राजस्थान सरकार में मंत्री रहे हेमसिंह भडाना का सोमवार सुबह अलवर में निधन हो गया। उनके निधन का समाचार बहुत ही दुखद और पीडा दायक है, पर कहते है यह फैसला दुनिया के किसी भी व्यक्ति के हाथ में नहीं होता, इसलिए इसे स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं होता। मिशनसच की ओर से ईश्वर से प्रार्थना करते है कि वह अपने श्रीचरणों में उन्हें स्थान दें। 

    स्मृति शेष : राजेश रवि 

    जानिए कौन थे हेमसिंह भडाना , जनता उन्हें क्यों पसंद करती थी

    राजनीति में सफलता केवल कुर्सी पाने से नहीं मापी जाती, बल्कि उस संघर्ष और सेवा की भावना से आंकी जाती है, जो एक जनप्रतिनिधि अपने समाज और जनता के लिए करता है। हेमसिंह भड़ाना एक ऐसे नेता थे। जिन्होंने जनसेवा को जीवन का धर्म मानते हुए राजनीति में प्रवेश किया और अपने समर्पण, स्पष्टवादिता और सेवा भावना से लोगों का दिल जीता। पार्टी में रहते हुए भी अनुशासन को तो स्वीकारा पर अन्याय के खिलाफ वहां भी बोले। 

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    राजनीति में संघर्षपूर्ण शुरुआत

    1998 में पहली बार वे थानागाजी विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरे। संसाधन कम थे, पर जज़्बा और जनसमर्थन भरपूर था। भले ही वे यह चुनाव नहीं जीत सके, लेकिन दूसरे स्थान पर रहकर उन्होंने अपनी राजनीतिक ताकत का एहसास करा दिया। भाजपा प्रत्याशी को चौथे स्थान पर धकेल देना इस बात का प्रमाण था कि जनता उन्हें पसंद करती है।

    2003 में उन्होंने भाजपा से चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी में बगावत के चलते सफलता नहीं मिल पाई और वे फिर दूसरे स्थान पर रहे। परंतु हेमसिंह भड़ाना जैसे नेता के लिए हार केवल एक विराम होती है, पराजय नहीं। चुनाव के कुछ समय बाद उन्होंने किशनगढ़बास पंचायत समिति से चुनाव लड़ा और प्रधान पद पर जीत हासिल की। इस पद पर रहते हुए उन्होंने जमीनी स्तर पर जनकल्याणकारी कार्यों को गति दी और ग्रामीणों का विश्वास अर्जित किया।

    विधानसभा और मंत्री पद तक का सफर

    2008 में वे एक बार फिर थानागाजी विधानसभा से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े और जीत हासिल की। यह उनकी पहली विधायक बनने की सफलता थी। उन्होंने क्षेत्र की जनता के मुद्दों को मुखरता से विधानसभा में उठाया और एक जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी मजबूत छवि बनाई।

    2013 में न केवल उन्होंने पुनः चुनाव जीता, बल्कि उन्हें राजस्थान सरकार में खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग का कैबिनेट मंत्री भी बनाया गया। मंत्री रहते हुए उन्होंने पारदर्शिता, ईमानदारी और जनहित की योजनाओं को धरातल पर उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस दौरान उन्होंने अपने क्षेत्र में विकास की कमी भी नहीं छोड़ी। 

    पार्टी का टिकट नहीं मिला तो जनता का टिकट लिया 

    2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया,। उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और फिर से दूसरे स्थान पर रहे, जिससे स्पष्ट हो गया कि जनता का विश्वास उनके साथ अब भी कायम है। 2023 में उन्हें फिर भाजपा से टिकट मिला, परंतु वे पुनः चुनाव हार गए। इस बार उन्होंने चुनावी प्रक्रिया में अनियमितता के आरोप लगाए और उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जो फिलहाल विचाराधीन है। 

    जन आंदोलनों के कारण कई केस दर्ज 

    हेमसिंह भडाना का राजनीतिक जीवन केवल चुनावी मैदान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने जनता के हक के लिए सड़क पर उतरकर आंदोलन भी किए। जब थानागाजी जाने वाले सरिस्का मार्ग को बंद किया जाने लगा, तो उन्होंने इसका विरोध करते हुए आंदोलन खड़ा किया। मालाखेड़ा में भी उन्होंने जन आंदोलन का नेतृत्व किया और गुर्जर समाज के बड़े आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई। जनहित के इन आंदोलनों के कारण उन पर अनेक मुकदमे दर्ज हुए, जो आज भी विभिन्न अदालतों में विचाराधीन हैं, लेकिन वे स्पष्ट कहते थे – “मुझे केस की नहीं, जनता की चिंता है; सेवा ही मेरा धर्म है।”

    बचपन से नेतृत्व की भावना

    भडाना का राजनीतिक सफर अचानक शुरू नहीं हुआ। बचपन से ही उनमें नेतृत्व की प्रवृत्ति थी। सातवीं कक्षा में जब वे अपने स्कूल के कक्षा प्रतिनिधि और बाद में स्कूल प्रीमियर चुने गए, तभी उन्होंने मन बना लिया था कि उन्हें अपने जीवन में कोई सरकारी नौकरी नहीं करनी, बल्कि लोगों की सेवा का मार्ग चुनना है। यही वह क्षण था, जिसने उनके जीवन की दिशा निर्धारित कर दी।

    कॉलेज से राजनीति में प्रवेश

    कॉलेज जीवन में भी उनका नेतृत्व कौशल उजागर हुआ। 1991 में वे अलवर के कला एवं विधि महाविद्यालय के छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए। छात्र राजनीति के इस मंच ने उन्हें जनसमस्याओं के करीब लाकर खड़ा कर दिया और वे पूर्णकालिक राजनीति की ओर अग्रसर हो गए। उनका मानना है कि छात्रसंघ की राजनीति समाज के भविष्य नेताओं को गढ़ने की प्रयोगशाला होती है।

    सादा जीवन, सच्चे मूल्य

    भडाना की सबसे बड़ी पहचान उनका सादगीपूर्ण जीवन है। वे कभी भी अपने स्वागत में नोटों की माला पहनने को तैयार नहीं होते। कई बार ऐसा हुआ कि समर्थक नोटों की माला लेकर आए, लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया। वे कहते थे, “सम्मान प्रेम से किया जाए, सादगी से किया जाए, वही वास्तविक होता है।” परंपरागत साफा या फूलों की माला हो, तो वे सहर्ष स्वीकार करते थे ।

    परिवार और निजी जीवन

    हेमसिंह भडाना के परिवार में पत्नी श्रीमती कृष्णा देवी हैं, जो कि एक घरेलू महिला होते हुए भी सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेती हैं। उनके दो बेटे हैं – धीरेंद्र सिंह और सुरेंद्र सिंह हैं। उनकी दो बेटियों की शादी हो चुकी है।

    अनुभव और नेतृत्व में सहयोग

    राजनीतिक जीवन में उन्होंने कई दिग्गज नेताओं के साथ काम किया है। इनमें राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, वरिष्ठ नेता अरुण सिंह, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनियां, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और भूपेंद्र यादव जैसे वरिष्ठ नेताओं के नाम शामिल हैं। इन सबके साथ मिलकर उन्होंने संगठन और सरकार दोनों में सक्रिय भूमिका निभाई ।

    युवाओं के लिए संदेश 

    हेमसिंह भडाना युवाओं को राजनीति में सेवा भावना के साथ आने का संदेश देते थे । उनका मानना था कि राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं है, बल्कि यह समाज को दिशा देने का माध्यम है।

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