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    रावण के मामा का गांव, जहां पर हुआ था सुबाहुं का अंत, विकास की उपेक्षा का है शिकार

    बलिया: आइए आज हम आपको पौराणिक और ऐतिहासिक गांव की तरफ ले चलते हैं, जी हां कैमरा जैसे ही गांव की सीमा में प्रवेश करता है, सबसे पहले दूर तक फैली हरियाली, लहलहाते खेत, शांत वातावरण और मिट्टी की सौंधी खुशबू पर नजर पड़ती है, जो सब कुछ मन को सुकून दे रहा था. यही वो गांव था, जहां पौराणिक इतिहास और वर्तमान एक-दूसरे से टकराते नजर आ रहे थे. यह गांव राम और रावण के कहानी को मानो जीवंत कर रहा था और कुछ बोल रहा था.

    रामायण काल से जोड़कर देखा जाता है यह गांव
    आपको बताते चलें कि यह जनपद बलिया के चितबड़ागांव थाना क्षेत्र अंतर्गत सुजायत गांव हैं, जिसे रामायण काल से जोड़कर देखा जाता है. स्थानीय बुजुर्गों (गामा और मुखराम) ने कहा कि, मान्यताओं के अनुसार, यहीं पर रावण का मामा सुबाहूं, जो त्रिजटा और सुंद का पुत्र था, रहा करता था. कैमरा आगे बढ़ता है और एक प्राचीन टीले पर ठहरता है. यह टीला न केवल मिट्टी का ढेर है, बल्कि हजारों साल पुराने इतिहास का गवाह भी है.

    कहते हैं कि, सुबहूं के नाम पर ही इस गांव का नाम सुजायत पड़ा है. पुरातात्विक दृष्टिकोण से भी यह स्थान महत्वपूर्ण माना जाता है. प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय के मुताबिक, पुरातत्व विभाग द्वारा यहां खुदाई कराई गई थी, जिसमें कई प्राचीन अवशेष मिले थे, जो इस क्षेत्र की ऐतिहासिक प्रामाणिकता की ओर संकेत करते हैं. यही पर भगवान राम में सुबाहु का वध किया था. बलिया में भगवान राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र आए थे, जिसको लेकर बलिया में एक पुरानी कहावत बड़ी फेमस है, जो इस प्रकार है भोर भरवली भए उजियारा, बक्सर जाए ताड़का मारा.

    विकास की उपेक्षा है यह गांव
    गांव से कुछ दूरी पर, जहां कभी सुबहूं का भाई मारीच रहा करता था. उसी के नाम पर बसा गांव मरिचि, आज लगभग इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह गया है. उसका भौतिक अस्तित्व अब मुश्किल से दिखाई देता है. वापस सुजायत में लौटते ही दृश्य बदल जाता है. ओवरफ्लो होती नालियां, टूटी सड़कें, झुग्गी-झोपड़ियां और बुनियादी सुविधाओं की कमी कही न कही आधुनिक भारत की एक कड़वी सच्चाई को भी उजागर करता है. इतना समृद्ध इतिहास रखने वाला यह गांव आज विकास से कोसों दूर खड़ा है.
    इतिहास बनकर रह गया है यह गांव
    यह डॉक्यूमेंट्री न केवल एक गांव की कहानी है, बल्कि उस विरासत की आवाज़ है, जिसे समय के साथ भुलाया जा रहा है. सवाल वहीं पुराना है कि, क्या इतिहास केवल किताबों में सिमट कर रह जाएगा या कभी उसे उसका हक भी मिलेगा? हालांकि, यही गांव अपने आप में ऐतिहासिक है. यहां के लोगों का कहना है कि, यह पौराणिक टीला अब जंगल झाड़ में तब्दील हो रहा है, इसको बचाने की जरूरत

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