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    क्या सच में पाताल तक जाती हैं इस मंदिर की सीढ़ियां? विश्वकर्मा की अधूरी रचना या चमत्कार? जानें सोफा मंदिर का अनसुलझा रहस्य

    महाशिवरात्रि आते ही देशभर के शिव मंदिरों में भीड़ उमड़ने लगती है, लेकिन कुछ जगहें ऐसी होती हैं जिनका नाम सुनते ही जिज्ञासा और श्रद्धा दोनों साथ जागते हैं. बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले में स्थित सोफा मंदिर भी ऐसी ही एक रहस्यमयी जगह है, जहां लोग सिर्फ दर्शन के लिए नहीं, बल्कि एक अनोखी मान्यता को महसूस करने आते हैं. कहा जाता है कि इस मंदिर में धरती के भीतर जाती सीढ़ियां पाताल लोक की ओर ले जाती हैं, जबकि कुछ लोग इसे स्वर्ग मार्ग भी कहते हैं. आस्था, कहानी और प्रकृति-तीनों का ऐसा मेल कम ही देखने को मिलता है. महाशिवरात्रि के मौके पर यहां का माहौल कुछ अलग ही हो जाता है, जब दूर-दराज से आए भक्त घंटों लाइन में खड़े होकर महादेव के दर्शन करते हैं.

    जंगलों के बीच बसा अनोखा शिव धाम
    सोफा मंदिर वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के मंगुराहा रेंज के पास, पंडई नदी के किनारे बसा है. यहां पहुंचते ही सबसे पहले जो चीज ध्यान खींचती है, वो है आसपास की हरियाली और गहरा सन्नाटा, जिसे सिर्फ पक्षियों की आवाज तोड़ती है. गौनाहा प्रखंड के दोमाठ गांव में स्थित यह मंदिर भारत-नेपाल सीमा के बेहद करीब है, इसलिए नेपाल से भी श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां आते हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक, पहले यहां तक पहुंचना आसान नहीं था. कच्चे रास्ते, जंगल और नदी पार करनी पड़ती थी. अब सड़क बेहतर हुई है, फिर भी यहां का माहौल शहरों से बिल्कुल अलग है. शायद यही वजह है कि लोग इसे सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, मन को सुकून देने वाली जगह भी मानते हैं.

    देवशिल्पी विश्वकर्मा से जुड़ी कथा
    अधूरी संरचना, पूरी आस्था
    इस मंदिर से जुड़ी सबसे मशहूर कथा भगवान विश्वकर्मा की है. मान्यता है कि उन्होंने एक ही रात में इस मंदिर का निर्माण शुरू किया था, लेकिन सूर्योदय से पहले काम पूरा नहीं हो सका. इसी कारण मंदिर की बनावट कुछ जगह अधूरी-सी दिखती है. पत्थरों की बनावट और पुरानी शैली को देखकर कई लोग मानते हैं कि यह बहुत प्राचीन स्थल है. मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यहां की अधूरी दीवारें और संरचना ही इसकी पहचान हैं. लोग इसे किसी कमी के रूप में नहीं, बल्कि चमत्कार की निशानी के तौर पर देखते हैं.
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    पाताल या स्वर्ग मार्ग?
    मंदिर के अंदर सबसे ज्यादा चर्चा उन सीढ़ियों की होती है, जो जमीन के भीतर उतरती हैं. ये सीढ़ियां कुछ दूरी बाद अंधेरे में खत्म हो जाती हैं. कोई साफ जवाब नहीं कि ये कहां तक जाती थीं, लेकिन मान्यता है कि यह रास्ता किसी दूसरे लोक तक पहुंचता है. कुछ बुजुर्ग इसे पाताल लोक का रास्ता कहते हैं, तो कुछ इसे स्वर्ग मार्ग मानते हैं. महाशिवरात्रि पर कई श्रद्धालु इन सीढ़ियों तक जाकर हाथ जोड़ते हैं, माथा टेकते हैं और मन की मुराद मांगते हैं. गांव की एक महिला बताती हैं कि उनकी मनोकामना पूरी होने के बाद से वह हर साल यहां जरूर आती हैं. ऐसे कई किस्से यहां सुनने को मिल जाते हैं, जो आस्था को और गहरा कर देते हैं.
    पर्यटन और आस्था का संगम
    सोफा मंदिर सिर्फ धार्मिक कारणों से ही खास नहीं है. पास में वाल्मीकि टाइगर रिजर्व होने से यहां आने वाले पर्यटक जंगल सफारी का भी मजा लेते हैं. बाघ, हिरण, जंगली सुअर और कई तरह के पक्षी इस इलाके को और दिलचस्प बनाते हैं. नदी किनारे बैठकर लोग घंटों समय बिताते हैं. हालांकि, यह इलाका वन क्षेत्र में आता है, इसलिए वन विभाग के नियमों का पालन जरूरी है. सफारी के लिए पहले अनुमति लेनी होती है. स्थानीय प्रशासन भी यहां सुविधाएं बढ़ाने में लगा है, ताकि बाहर से आने वालों को दिक्कत न हो.
    महाशिवरात्रि पर विशेष महत्व
    महाशिवरात्रि के दिन यहां मेले जैसा दृश्य होता है. भजन, घंटियां, फूल और प्रसाद की खुशबू-पूरा माहौल भक्ति में डूब जाता है. लोग मानते हैं कि इस दिन यहां दर्शन करने से खास फल मिलता है. सुबह से रात तक श्रद्धालुओं का आना जारी रहता है.
    सोफा मंदिर आस्था, रहस्य और प्रकृति का ऐसा संगम है, जो इसे बाकी मंदिरों से अलग पहचान देता है. चाहे आप इसे पाताल मार्ग मानें या सिर्फ एक प्राचीन धरोहर, यहां आकर मन जरूर ठहर जाता है.

     

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