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    तनाव, एंग्जायटी और गुस्से का इलाज है ‘ओम नमः शिवाय’? क्या सच में बदल रही है जिंदगी

    जब जिंदगी उलझनों में फंस जाती है, मन बार-बार हार मानने लगता है और हर दिशा बंद सी दिखती है, तब इंसान अक्सर किसी सहारे की तलाश करता है. कोई दोस्त, कोई गुरु, कोई विश्वास. ऐसे ही समय में कई लोग एक नाम का जिक्र करते हैं-“ओम नमः शिवाय”. यह सिर्फ धार्मिक आस्था की बात नहीं रह गई है, बल्कि अब लोग इसे मानसिक संतुलन, भावनात्मक मजबूती और जीवन की दिशा से जोड़कर देख रहे हैं. गांवों से लेकर शहरों तक, युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक, शिव नाम के जाप को लेकर नई चर्चा है. क्या सच में एक मंत्र इंसान के मन और व्यवहार में बदलाव ला सकता है? लोगों के अनुभव और विशेषज्ञों की राय इस सवाल को दिलचस्प बना देते हैं. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं

    शिव नाम का बढ़ता चलन: आस्था से आगे का अनुभव
    हाल के समय में सोशल मीडिया और आध्यात्मिक समुदायों में शिव मंत्र जाप की चर्चा तेजी से बढ़ी है. कई लोग बताते हैं कि रोज कुछ मिनट “ओम नमः शिवाय” जपने से उन्हें बेचैनी और गुस्से में कमी महसूस हुई. खास बात यह है कि इसे सिर्फ पूजा का हिस्सा नहीं, बल्कि एक मानसिक अभ्यास की तरह अपनाया जा रहा है. भोपाल की 28 वर्षीय आईटी प्रोफेशनल नीतिका कहती हैं, “वर्क प्रेशर में मैं बहुत चिड़चिड़ी हो गई थी. किसी ने कहा सुबह 5 मिनट शिव नाम लो. पहले मजाक लगा, पर एक महीने में फर्क महसूस हुआ-मैं जल्दी शांत हो जाती हूं.” ऐसे अनुभवों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे यह सवाल उठ रहा है कि मंत्र जाप का मन पर असर कितना वास्तविक है.

    मंत्र और मन: विज्ञान क्या कहता है
    ध्वनि और ब्रेन वेव्स का रिश्ता
    मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस से जुड़े कई अध्ययन बताते हैं कि किसी ध्वनि या शब्द की लगातार पुनरावृत्ति मस्तिष्क की तरंगों को धीमा कर सकती है. इससे मन का तनाव स्तर कम होता है और ध्यान की स्थिति बनती है. विशेषज्ञों का कहना है कि “ओम” उच्चारण के दौरान लंबी श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया अपने-आप सक्रिय होती है, जिससे नर्वस सिस्टम शांत होता है. यही कारण है कि कई ध्यान पद्धतियों में मंत्र जप शामिल है. इंदौर के मनोचिकित्सक डॉ. अमित जैन बताते हैं, “मंत्र जप को आप धार्मिक मानें या न मानें, यह एक प्रकार का फोकस्ड ब्रीदिंग और माइंडफुल रिपीटेशन है. इससे एंग्जायटी कम होने के प्रमाण मिले हैं.”

    बदलता व्यवहार: लोग क्या महसूस कर रहे
    शिव नाम जप से जुड़े लोगों के अनुभवों में कुछ समान बातें बार-बार सामने आती हैं-
    -गुस्से पर नियंत्रण
    -नकारात्मक सोच में कमी
    -निर्णय लेने में स्पष्टता
    -डर और असुरक्षा कम होना
    खंडवा के व्यापारी राजेश तिवारी बताते हैं, “लॉकडाउन में कारोबार ठप हो गया था. हर सुबह 108 बार ओम नमः शिवाय जपने लगा. धीरे-धीरे मन स्थिर हुआ और नए काम की हिम्मत आई.” हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी भी देते हैं कि मंत्र को चमत्कारिक समाधान मानना ठीक नहीं. इसे मानसिक अनुशासन या आध्यात्मिक अभ्यास की तरह देखना ज्यादा व्यावहारिक है.

    शिव की अवधारणा: सरलता और वैराग्य का प्रतीक
    धार्मिक ग्रंथों और लोक मान्यताओं में शिव को ऐसे देव के रूप में देखा गया है जो भौतिक वैभव से दूर रहते हैं. कैलाश, ध्यान, साधना-इन प्रतीकों को लोग जीवन की सादगी और संतुलन से जोड़ते हैं.
    आध्यात्मिक लेखक मानते हैं कि शिव नाम का आकर्षण इसी वजह से है-यह किसी वैभव या इच्छा से नहीं, बल्कि भीतर की शांति से जुड़ा है. उज्जैन के आध्यात्मिक शोधकर्ता पंडित संजय व्यास कहते हैं, “शिव नाम लेने का भाव ही व्यक्ति को भीतर झुकाता है. यह अहंकार कम करने का मनोवैज्ञानिक असर भी डालता है.”
    क्या सच में बदलती है जिंदगी
    इस प्रश्न का जवाब सीधा “हां” या “नहीं” में नहीं दिया जा सकता, लेकिन यह साफ है कि नियमित मंत्र जप, ध्यान या प्रार्थना जैसी आदतें व्यक्ति के व्यवहार और भावनात्मक प्रतिक्रिया को प्रभावित करती हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कोई व्यक्ति रोज कुछ समय शांत बैठकर एक शब्द या मंत्र पर ध्यान केंद्रित करता है, तो उसका मन व्यवस्थित होने लगता है. यह बदलाव धीरे-धीरे निर्णय, संबंध और जीवन दृष्टि पर असर डाल सकता है. यही वजह है कि आज कई लोग “ओम नमः शिवाय” को सिर्फ धार्मिक जप नहीं, बल्कि मानसिक स्थिरता की दिनचर्या की तरह अपना रहे हैं.

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