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    पाकिस्तान में शेरशाह सूरी की प्रतिमा हटाने पर छिड़ी बहस, सरंग खान की प्रतिमा लगाई

    लाहौर,। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के झेलम में शेरशाह सूरी की प्रतिमा हटाए जाने की खबर ने बहस छेड़ दी है। कुछ दिन पहले ही स्थानीय प्रशासन ने चौराहे पर लगी प्रतिमा को हटाकर उसकी जगह सुल्तान सरंग खान गखर की मूर्ति लगा दी है। इस तरह सिंध के कुछ इलाकों में भी पुराने शासकों से जुड़ी प्रतिमाओं और प्रतीकों को हटाने की खबरें सामने आई हैं। सवाल उठ रहा है कि जिन ऐतिहासिक शख्सियतों को पाकिस्तान दशकों तक अपना गौरव बताता रहा, उनसे दूरी क्यों बनाई जा रही है? शेरशाह सूरी की प्रतिमा हटाए जाने की घटना ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या पाकिस्तान अपने ऐतिहासिक प्रतीकों को अब नई नजर से देख रहा है? अब उनकी मूर्तियां हटाई जा रहीं है और उनके स्थान पर स्थानीय नायकों को क्यों जगह दी जा रही है?
    मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 1947 में भारत से अलग होकर बने पाकिस्तान ने अपनी वैचारिक नींव मुस्लिम पहचान पर रखी थी। देश के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने एक अलग राष्ट्र की परिकल्पना की थी। इसके बाद पाकिस्तान के इतिहास लेखन में मध्यकालीन इस्लामी शासकों को प्रमुखता दी गई। शेरशाह सूरी, महमूद गजनी और मुहम्मद गोरी जैसे शासकों को वहां की पाठ्य पुस्तकों में मुस्लिम शक्ति और विजय के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। शेरशाह सूरी को ग्रैंड ट्रंक रोड का निर्माता और कुशल प्रशासक बताया गया। महमूद गजनवी और मुहम्मद गोरी को भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम शासन की नींव रखने वाला बताया और पाकिस्तानी मुस्लिम कौम का हीरो माना।
    पाकिस्तान ने अपने सैन्य उपकरणों के नाम भी इन शासकों पर रखे। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान की शॉर्ट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल का नाम गजनवी और मीडियम रेंज मिसाइल का नाम गौरी रखा। यह दिखाता है कि इन ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा गया। ऐसे में झेलम में शेरशाह सूरी की प्रतिमा हटाए जाने को केवल स्थानीय प्रशासनिक फैसला मानना आसान नहीं है। बता दें शेरशाह सूरी का जन्म 15वीं सदी के अंत में बिहार के सासाराम में हुआ था। वे अफगान मूल के सूरी कबीले से थे। उन्होंने 16वीं सदी में दिल्ली की गद्दी पर कब्जा किया और मुगल बादशाह हुमायूं को कुछ समय के लिए सत्ता से बेदखल कर दिया था। शेरशाह सूरी (1486-1545) उत्तर भारत में सूरी साम्राज्य के संस्थापक थे। उन्होंने 1540 से 1545 तक केवल पांच सालों के लिए दिल्ली पर शासन किया था। उनका शासनकाल छोटा था, लेकिन प्रशासनिक सुधारों के लिए उन्हें जाना जाता है। उन्होंने सड़क, डाक व्यवस्था और राजस्व प्रणाली में बदलाव किए। यही कारण है कि भारतीय इतिहास में उन्हें एक सक्षम शासक के रूप में भी याद किया जाता है।
    इतिहासकार बताते हैं कि महमूद गजनवी और मोहम्मद गौरी दोनों का मूल अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जुड़ा था। हाल के वर्षों में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्तों में तनाव देखने को मिला है। सीमा पर झड़पों और कूटनीतिक मतभेदों ने दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित किया है। पाकिस्तान में अब ऐतिहासिक प्रतीकों की पुनर्व्याख्या हो रही है। झेलम में सुल्तान सरंग खान गखर की प्रतिमा स्थापित किया जाना भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है, जहां स्थानीय नायकों को आगे लाने की कोशिश हो रही है।

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