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    रतलाम का सिपावरा बनेगा रीलिजियस टूरिस्ट हब, भस्मासुर से बचने यहीं छिपे थे भगवान शिव

    रतलाम: आलोट में शिप्रा और चंबल नदी के संगम स्थल सिपावरा की इन दिनों खूब चर्चा हो रही है. प्रदेश के मुखिया डॉ. मोहन यादव ने आलोट में आयोजित कार्यक्रम में सिपावरा तीर्थ को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने और शिप्रा नदी में क्रूज चलाए जाने की बात कही है. लेकिन यह अति प्राचीन विरासत वर्षों से गुमनामी में रहा है.

    यह पवित्र संगम स्थल सप्त ऋषि में से एक पुलस्त्य ऋषि की तपोभूमि और भगवान शिव के ठहरने का स्थान बताया जाता है. यहां भगवान शिव का दीपेश्वर महादेव मंदिर है. अब पुरातात्विक महत्व और इस पावन तीर्थ की सुध प्रदेश सरकार ने ली है. आईए जानते हैं सिपावरा संगम स्थल की कहानी.

    रतलाम जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर चंबल और शिप्रा नदी के संगम स्थल सिपावरा में अति प्राचीन तीर्थ स्थल है. यहां 3200 साल पुरानी ताम्राश्म युगीन सभ्यता से जुड़े कई अवशेष मिले हैं. राजा भोज के काल के मंदिर भी यहां मिले हैं. यहां करीब 100 फीट ऊंचा एक प्राचीन टीला है जिसके आसपास अति प्राचीन अवशेष मिलते हैं.
    दीपेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी रमेश पूरी गोस्वामी ने बताया "सप्त ऋषि में से एक और रावण के दादा पुलस्त्य ऋषि ने यहां वर्षों तक तपस्या की थी. पुराणों में पुलस्त्य ऋषि के द्वारा मेरु पर्वत और प्राचीन टीले पर तपस्या करने का उल्लेख है. जिसे स्थानीय लोग सिपावरा का प्राचीन टीला भी बताते हैं. संगम स्थल पर ही नदी के पानी में एक कुंड है. जिसे पौराणिक काल का बताया जाता है."
    यहां स्थित प्राचीन दीपेश्वर मंदिर को लेकर किंवदंती है कि जब भगवान शिव ने भस्मासुर को वरदान दिया था तो वह अहंकार में चूर होकर शंकर भगवान को ही भस्म करने के लिए निकल पड़ा था. तब भगवान शिव ने सिपावरा में संगम स्थल पर अपना पड़ाव बनाया था. इसके बाद भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर भस्मासुर का संहार किया था.
    इसके बाद भगवान विष्णु सभी देवी-देवताओं के साथ दीपक लेकर भगवान शंकर को ढूंढने के लिए निकले तो यहां उन्हे भगवान शिव मिले. बताया जाता है कि सभी देवताओं ने अपने हाथों में लिए दीपक यहां उल्टे रख दिए थे. मंदिर के पुजारी रमेश पुरी गोस्वामी बताते हैं "आज भी यहां उल्टे रखे हुए दीपक खुदाई में मिलते हैं."
    अति पुरातात्विक महत्व के इस प्राचीन संगम स्थल पर ध्यान नहीं दिए जाने और नदियों में आने वाली बाढ़ की वजह से इस टापू का लगातार क्षरण हो रहा है. मंदिर तक पहुंचने के लिए अच्छी सड़क न होना भी इस तीर्थ स्थल की गुमनामी का अहम कारण है. लेकिन इस प्राचीन तीर्थ स्थल के दिन अब बदलने वाले हैं और धार्मिक पर्यटन के नक्शे पर जल्दी ही यह संगम स्थल सिपावरा दिखने जा रहा है.

    प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने आलोट में आयोजित कार्यक्रम में इस तीर्थ स्थल के कायाकल्प का जिक्र किया है. इससे पूर्व मध्य प्रदेश हाउसिंग बोर्ड के माध्यम से डीपीआर तैयार कर करीब 23.8 करोड़ रुपए प्रस्ताव भेजा गया है, जिसमें मंदिर के जीर्णोद्धार सहित करीब 7 एकड़ क्षेत्र में पर्यटन केंद्र विकसित किया जाएगा. इसके साथ ही सिंहस्थ 2028 के पूर्व दीपेश्वर महादेव मंदिर और संगम स्थल को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित कर लिया जाएगा. वहीं, नदी के तटों को विकसित कर क्रूज चलाने की बात भी प्रदेश के मुखिया ने कही है.
     

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