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    Homeधर्म-समाज1 या 2 मार्च? कब है रवि प्रदोष व्रत,

    1 या 2 मार्च? कब है रवि प्रदोष व्रत,

    हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का खास महत्व माना जाता है. यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए रखा जाता है. मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई आराधना से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं. माना जाता है कि प्रदोष के दिन व्रत रखने से घर में सुख-शांति, समृद्धि और सफलता का आशीर्वाद मिलता है. हर महीने दो प्रदोष व्रत आते हैं, जो त्रयोदशी तिथि को मनाए जाते हैं. इस दिन भक्त सुबह से व्रत रखकर शाम के समय भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा करते हैं. शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित किए जाते हैं और आरती के बाद व्रत का पारण किया जाता है. , मार्च का पहला और फाल्गुन मास का अंतिम प्रदोष व्रत विशेष फलदायी माना जा रहा है. इस दिन श्रद्धा और नियम से पूजा करने पर विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है.

    वैदिक पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 28 फरवरी दिन शनिवार को रात 8 बजकर 43 मिनट के लगभग से शुरू होगी. यह तिथि एक मार्च दिन रविवार को शाम 7 बजकर 9 मिनट के लगभग तक रहेगी. प्रदोष व्रत में उदयातिथि नहीं बल्कि प्रदोष काल के पूजा मुहूर्त को ही मान्यता दी जाती है. इसी कारण मार्च महीने का पहला प्रदोष व्रत एक मार्च को रखा जाएगा. रविवार होने की वजह से यह रवि प्रदोष व्रत कहलाएगा, जिसका विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है.
    रवि प्रदोष व्रत का महत्व
    रवि प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव के साथ सूर्यदेव की पूजा करना भी बहुत शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन दोनों देवताओं की आराधना करने से व्यक्ति को करियर में आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं और सफलता के नए रास्ते खुलते हैं. जो लोग नौकरी या व्यवसाय में प्रगति चाहते हैं, उनके लिए यह दिन खास माना जाता है. शिव पुराण और स्कंद पुराण में भी रवि प्रदोष व्रत का महत्व बताया गया है. इनमें उल्लेख है कि इस दिन श्रद्धा और नियम से उपवास रखने पर व्यक्ति को रोगों से राहत मिलती है और जीवन के कई दोष दूर होते हैं, साथ ही घर में सुख-समृद्धि और धन की वृद्धि का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है. इस व्रत को आस्था और विश्वास के साथ करना लाभकारी माना जाता है.

    इन नियमों का जरूर करें पालन
    1. प्रदोष व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि के बाद सूर्यदेव को अर्घ्य देकर व्रत का संकल्प लें.
    2. इसके बाद पूजा स्थल की अच्छे से सफाई करके भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक करें.
    3. शिव परिवार का पूजन करें और भगवान शिव पर बेल पत्र, फूल, धूप, दीप आदि अर्पित करें. इसके बाद प्रदोष व्रत की कथा का पाठ करें.
    4. पूजा के अंत में भगवान शिव की आरती करें और शिव चालीसा का पाठ जरूर करें. इसके बाद ही अपना उपवास खोलें.

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