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    राजस्थान में वोट बैंक बना नील गाय का सबसे बड़ा शिकारी

     राजस्थान : राज्यपाल ने केंद्र व राज्य सरकार से मांगी रिपोर्ट

    राजेश रवि , वरिष्ठ पत्रकार

    राजस्थान सरकार  इजाजत लेकर नील गाय की हत्या की अधिसूचना को वापिस लेगी या राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े के पत्र के आधार पर केंद्र सरकार के पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के संयुक्त निदेशक को भी कोई ऐसी रिपोर्ट भेज देगी जिससे इस अधिसूचना पर कोई असर नहीं होगा।  इस मामले पर लगातार यह सवाल उठता है कि जीवों की सुरक्षा का दावा करने वाली सरकार आखिर डरती किससे है। राज्यपाल ने इस मामले में पहल करते हुए केंद्र व राज्य सरकार को पत्र लिखा है।

    केंद्र का पत्र
    केंद्र का पत्र

    मान्यता है कि भाजपा सरकार यानी जीव दया, यानी संतों की आवाज को प्राथमिकता , यानी संस्कृति की रक्षा । पर राजस्थान की एक अधिसूचना इन सभी बातों पर सवाल उठाती है और सरकार को चेताती है कि आप अपनी नीति के खिलाफ काम कर रहे हो । तीस साल हो गए सरकार पर जूं तक नहीं रैंग रही। अधिसूचना है वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत की अनुसूची–III (Schedule III) में शामिल नीलगाय की इजाजत लेकर हत्या की । हालांकि धारा 11 के तहत इस तरह की अधिसूचना जारी हो सकती है पर यह तब जब यह जीव फसल को बहुत अधिक नुकसान पहुंचा रहा हो या किसानों व जनता की ओर से कोई मांग उठ रही हो। ऐसा कभी भी नहीं हुआ पर चुनावी राजनीति ने इस आदेश को जारी करवा दिया। अधिसूचना को वापिस लेने के लिए पूरे प्रदेश के हजारों ज्ञापन, सड़क पर चले आंदोलन, संतों की अपील के बाद भी सरकार की चुप्पी है। । खास बात यह है कि किसानों की ओर से यह मांग कभी की ही नहीं गई। तीस साल आदेश जारी हुए हो गए पर किसी भी किसान ने कभी इजाजत भी नहीं ली।
    राजस्थान में पेड़, पहाड़ और वन्य जीव सुरक्षित हैं या नहीं। यह सवाल अब केवल पर्यावरणविदों का नहीं रहा। यह सवाल लोकतंत्र, शासन की नैतिकता और सरकार की रीढ़ से जुड़ गया है। पिछले तीन दशकों से एक ही मुद्दा बार-बार सामने आ रहा है और हर बार सरकार उसी जगह ठिठक जाती है। कारण न कानून है, न प्रशासनिक बाधा कारण है वोट का डर। वर्ष 1994 की अधिसूचना पर सरकार जानती है कि उसके ही आदेश व्यावहारिक नहीं है, नैतिक नहीं हैं और सच कहे तो कानूनी भी नहीं है। फिर भी उन्हें वापस लेने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही।
    आदेश है, पर उपयोग शून्य
    मार्च 1994 में राज्य सरकार ने नीलगाय को किसानों की फसल के लिए खतरा बताकर कुछ जिलों में मारने की अनुमति दी। 1996 में दायरा बढ़ा। 31 अगस्त 2000 को तो हद ही हो गई। पूरे राजस्थान में थाना प्रभारी से लेकर कलेक्टर तक को यह अधिकार दे दिया गया। तीस साल बीत गए। एक भी किसान सामने नहीं आया। एक भी अनुमति नहीं ली गई। एक भी वैध शिकार दर्ज नहीं हुआ।यह तथ्य खुद सरकार के मंत्री सार्वजनिक मंच से स्वीकार कर चुके हैं। फिर भी आदेश आज तक जीवित है। तो सवाल सीधा है । यह आदेश किसानों के लिए नहीं, राजनीति के लिए जिंदा रखा गया है। राजस्थान की हर सरकार जानती है कि नीलगाय को मारने की अनुमति देना न तो समस्या का समाधान है, न ही संवैधानिक रूप से मजबूत आधार वाला निर्णय। सरकार यह भी जानती है कि सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से यह फैसला जनभावनाओं के खिलाफ है।फिर भी सरकार इसे वापस नहीं लेती।
    सरकार की तीन दशक की चुप्पी
    करीब तीस साल से सामाजिक संगठन, संत समाज और पर्यावरण प्रेमी इस आदेश को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। 500 से ज्यादा ज्ञापन प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तक जा चुके हैं। 100 से ज्यादा जैन दिगंबर और श्वेतांबर संत सार्वजनिक रूप से इसका विरोध कर चुके हैं। जयपुर से अलवर तक धरने हो चुके हैं।लेकिन सरकार टस से मस नहीं हुई।यह चुप्पी साधारण नहीं है। यह राजनीतिक चुप्पी है । जो हर सरकार की पहचान बनती जा रही है। इस आंदोलन को शुरू के समय आम आदमी का सड़क पर भी समर्थन मिला पर धीरे धीरे लोग यह मानने लगे कि सरकार किसी की भी सुनने वाली नहीं है, पर अलवर के रहने वाले समाज सेवी ओमप्रकाश गुप्ता के लिए जैसे इस अधिसूचना को वापिस लेने का आदेश करवाना जीवन का उद्देश्य बन गया हो। वे हर रोज उठते बैठते इसी मुद्दे पर कुछ करते नजर आते है। अभी हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने अलवर में टाइगर बचाने के लिए मैराथन करवाई तो भी ओमप्रकाश गुप्ता ने इस सवाल को उठाया। राज्यपाल अलवर आए तो उनको ज्ञापन दिया जिस पर अब एक्शन की उम्मीद बनी है। 
    जब अहिंसा बोलती है और सत्ता खामोश रहती है
    जैन संतों आचार्य सुधासागर, ज्ञानसागर महाराज, पुलक सागर सहित अनेक ने इस मामले को खुले मंचों से उठाया है। सरकार और लोगों से अपील की है। वर्तमान की बात करे तो यह विडंबना नहीं, बल्कि त्रासदी है कि राजस्थान का वन मंत्री और केंद्र सरकार का वन मंत्री ,दोनों अलवर जिले से हैं। जहां से इस आंदोलन की सबसे मजबूत आवाज उठी, वहीं से सत्ता का सबसे बड़ा मौन देखने को मिला। लोगों ने तय किया है कि अब मामला सुप्रीम कोर्ट में ले जाना होगा। संभव है कि न्यायपालिका इस आदेश की वैधानिकता पर सवाल उठाए। लेकिन उससे पहले सरकार के पास आज भी मौका है। खुद यह स्वीकार करने का कि यह आदेश गलत था।

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