पानी , जंगल और जीव सभी एक दूसरे के पूरक, इन्हें बचाना आवश्यक
टाइगर प्रोजेक्ट के स्थापना दिवस पर विशेष

राजेश रवि , मिशनसच न्यूज।
1 अप्रैल, 1973। दिल्ली में एक फाइल पर दस्तखत हुए। और उन दस्तखतों ने इतिहास बदल दिया। उस वक्त भारत में बाघों की तादाद सिर्फ 1,827 रह गई थी। जो जानवर कभी इस देश के जंगलों का बादशाह था, वो अब गिनती के दिनों का मेहमान लग रहा था। शिकारियों की बंदूकें, जंगलों की कटाई और इंसानी लालच ने मिलकर बाघ को विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया था। लेकिन फिर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक ऐसा फैसला किया, जिसे दुनिया आज भी सलाम करती है। वह था टाइगर प्रोजेक्ट ।
वो दौर जब बाघ मर रहा था
बीसवीं सदी की शुरुआत में भारत में करीब 40,000 बाघ थे। पर अंग्रेजों के जमाने में शिकार एक शौक था । रियासतें मेहमानों को “टाइगर शूट” पर ले जाती थीं। जो राजा जितने बाघ मारता, वो उतना बड़ा शिकारी कहलाता। कहते है कुछ शिकारियों के नाम पर 1,000 से ज्यादा बाघ मारने के रिकॉर्ड दर्ज हैं।
आजादी के बाद भी हालात नहीं बदले
1972 में जब पहली बार गिनती हुई, तो आंकड़ा देखकर पूरे देश की सांसें रुक गईं। सिर्फ 1,827 बाघ। उसी साल तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी स्टॉकहोम में संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण सम्मेलन में गईं और दुनिया को एक सच्चाई सुनाई जो किसी नेता ने पहले इतनी साफगोई से नहीं कही थी “गरीबी सबसे बड़ा प्रदूषण है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम प्रकृति को लूटते रहें।”और घर लौटकर उन्होंने प्रोजेक्ट टाइगर की नींव रखी।
शुरुआत : 9 जंगल, एक सपना
शुरुआत में देश के 9 टाइगर रिजर्व चुने गए। इन जंगलों में शिकार पर पूरी तरह पाबंदी लगी। वैज्ञानिक निगरानी शुरू हुई। बाघ के इलाके को “कोर जोन” घोषित किया गया । जहाँ इंसान की एंट्री तक बंद। आज यह संख्या बढ़कर 54 टाइगर रिजर्व हो चुकी है । जो देश के 18 राज्यों में फैले हैं ।

1989 में एक बार संख्या 4,334 तक पहुँची, फिर गिरी, फिर उठी। यह संघर्ष सिर्फ आँकड़ों में नहीं था — जंगलों में, रिजर्व के गेटों पर, वन अधिकारियों की रातों में था।
सरिस्का : जब बाघ मर गया, और फिर जिया
राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का टाइगर रिजर्व का नाम सुनते ही एक दर्दनाक सच्चाई याद आती है।2004-05। खबर आई कि सरिस्का में एक भी बाघ नहीं बचा।पूरे देश में हड़कंप मच गया। संसद में सवाल उठे। जाँच बैठाई गई। पता चला शिकारियों के गिरोह ने एक-एक करके सभी बाघ मार डाले थे। जो सिस्टम बाघों की रक्षा के लिए बना था, वो शिकारियों के आगे बेदम साबित हुआ।2008 में इतिहास में पहली बार देश के एक जंगल से बाघ पकड़कर दूसरे जंगल में बसाए गए। रणथंभोर से सरिस्का तक। रेडियो कॉलर, वन अधिकारियों की चौकसी, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और धीरे-धीरे सरिस्का में फिर से पैरों के निशान दिखने लगे।आज सरिस्का में 50 से अधिक बाघ हैं। यह रिजर्व दुनिया के सफलतम “टाइगर रिलोकेशन” प्रयोगों में गिना जाता है। वर्तमान में अलवर के लिए यह खास है कि यहां के सांसद भूपेंद्र यादव केंद्र में पर्यावरण मंत्री है और शहर विधायक संजय शर्मा राजस्थान के वन एवं पर्यावरण मंत्री है। इसलिए लोगों की उम्मीद सरिस्का के विकास की और अधिक बढ़ जाती है। बस एक ही संकल्प लेना है टाइगर को बचाना है।
बाघ बचा तो जंगल बचा, जंगल बचा तो हम बचे
लोग सोचते हैं कि बाघ बचाना सिर्फ एक जानवर को बचाना है। यह गलतफहमी है। बाघ “अम्ब्रेला स्पीशीज़” है — यानी जहाँ बाघ है, वहाँ पूरा पारिस्थितिकी तंत्र जिंदा है। बाघ के जंगल में हिरण हैं, हिरण के लिए घास है, घास के लिए पानी है, पानी से खेत हरे हैं। एक बाघ की रक्षा दरअसल हजारों प्रजातियों, लाखों पेड़ों और करोड़ों इंसानों के पानी की रक्षा है।Project Tiger — बाघों की संख्या
भारत के टाइगर रिजर्व देश की प्रमुख नदियों के उद्गम स्थलों की रखवाली करते हैं — गंगा, यमुना, नर्मदा, कावेरी — इन सब नदियों का पानी उन्हीं जंगलों से आता है जहाँ बाघ घूमते हैं।
NTCA — वो निगहबान जो सोता नहीं
आज प्रोजेक्ट टाइगर की निगरानी National Tiger Conservation Authority (NTCA) करती है। यह संस्था पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत काम करती है।हर चार साल पर देशभर में बाघों की गिनती होती है — कैमरा ट्रैप, पगमार्क, DNA सैंपल और उपग्रह चित्रों की मदद से। यह दुनिया का सबसे बड़ा वन्यजीव सर्वेक्षण है। 2023-24 की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि भारत में बाघों की संख्या अब 3,682 से ऊपर पहुँच चुकी है।
वो एक सबक जो दुनिया सीख रही है
प्रोजेक्ट टाइगर ने साबित किया कि कोई भी प्रजाति अगर विलुप्ति के कगार पर हो, तो इंसान चाहे तो उसे वापस ला सकता है। सरिस्का इसका जीता-जागता सबूत है।इंदिरा गांधी ने 1973 में एक फाइल पर दस्तखत करके सिर्फ बाघ नहीं बचाया था। उन्होंने भारत की आत्मा का एक हिस्सा बचाया था। वो हिस्सा जो कहता है: यह धरती, यह जंगल, यह नदियाँ हमारी विरासत हैं। इनकी रक्षा करना हमारा फर्ज है।
आज जब दुनिया जैव विविधता के संकट में डूबी है, तब भारत का यह मॉडल सिर्फ एक सफलता की कहानी नहीं । यह एक उम्मीद की किरण है।
आओ पर्यावरण बचाने का संकल्प लें

राजीव गांधी पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित राजेश कृष्ण सिद्ध का कहना है कि आज समय की सबसे बड़ी जरूरत पर्यावरण संरक्षण है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रकृति प्रेम और उनके दूरदर्शी सोच को याद करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा पर्यावरण और वन्य जीवों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। आज हमें उनके उन्हीं सपनों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।राजेश कृष्ण सिद्ध ने कहा कि तेजी से बढ़ते प्रदूषण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है, जिसका असर सीधे मानव जीवन पर पड़ रहा है। ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह पेड़-पौधे लगाए, जल संरक्षण करे और वन्य जीवों की रक्षा में अपनी भागीदारी निभाए।
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