दीक्षा हीरक जयंती का आयोजन: अभिषेक, प्रवचन और संगोष्ठी से गूंजा अयोध्या
अयोध्या। श्री ऋषभदेव दिगम्बर जैन मंदिर, रायगंज में जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का 71वाँ आर्यिका दीक्षा हीरक जयंती महोत्सव हर्षोल्लासपूर्वक सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत भगवान ऋषभदेव की 31 फीट ऊंची प्रतिमा के पंचामृत अभिषेक से हुई। दूध, दही, घी, चंदन, पुष्पवृष्टि और सुगंधित द्रव्यों से अभिषेक कर विश्व शांति की कामना की गई। शांतिधारा मंत्रोच्चारण के साथ विशेष पूजा-अर्चना भी की गई।
इस अवसर पर गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने ‘षट्खण्डागम पुस्तक-1 (धवला टीका का सार)’ भगवान के चरणों में समर्पित की। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री सुभाषचंद जैन सर्राफ (लखनऊ) के मंगलाचरण से हुआ।
दीप प्रज्वलन का सौभाग्य संघपति श्री अनिल कुमार जैन (दिल्ली), श्री कमल कासलीवाल (मुंबई), श्री अतुल जैन और श्री विजय कुमार जैन को प्राप्त हुआ। साथ ही पिच्छिका, कमण्डलु, शास्त्र एवं वस्त्र प्रदान करने जैसे धार्मिक अनुष्ठान भी संपन्न हुए।
कार्यक्रम में मुनि श्री श्रीसागर जी महाराज के मंगल प्रवचन में उन्होंने कहा कि दीक्षा महोत्सव जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण होता है और ज्ञानमती माताजी का जीवन त्याग और वैराग्य की मिसाल है।
इस दौरान गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अपने प्रवचन में षट्खण्डागम ग्रंथ की महत्ता बताते हुए कहा कि यह जिनशासन का पहला लिपिबद्ध ग्रंथ है, जिसे आचार्य पुष्पदंत और भूतबली ने रचा था। उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वयं इसकी संस्कृत टीका 16 पुस्तकों में लगभग 3500 पृष्ठों में तैयार की, जो एक अद्भुत कार्य है।
गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का जन्म 1934 में बाराबंकी जिले के टिकैतनगर में हुआ था। उन्होंने 1956 में श्रीमहावीर जी तीर्थ पर आर्यिका दीक्षा ग्रहण की। तब से वे ज्ञान, ध्यान और धर्म प्रचार में निरंतर सक्रिय हैं।
उन्होंने लगभग 550 ग्रंथों की रचना कर जैन धर्म और जिनशासन की प्रभावना में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वे भगवान महावीर के 2600 वर्षों के इतिहास में पहली विदुषी साध्वी मानी जाती हैं।
इस महोत्सव में मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र, बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखंड सहित देशभर से श्रद्धालु पहुंचे। मध्यान्ह में विनयांजलि सभा आयोजित हुई, जिसमें समाज के अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने माताजी को श्रद्धांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम के अंत में त्रिदिवसीय राष्ट्रीय जैन विद्वत् सम्मेलन का समापन हुआ और सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया गया। साथ ही पूज्य माताजी की मंगल आरती भी सम्पन्न की गई।
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