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    Homeराज्यमहाराष्ट्रउपचुनाव में बढ़ी सियासी गर्मी, उद्धव गुट ने कांग्रेस को बताया ‘मतलबी’

    उपचुनाव में बढ़ी सियासी गर्मी, उद्धव गुट ने कांग्रेस को बताया ‘मतलबी’

    मुंबई | महाराष्ट्र में महाविकास आघाड़ी (MVA) में सब कुछ ठीक नहीं है. उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीटी और कांग्रेस के बीच तल्खी बढ़ती जा रही है. अब उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीटी के मुखपत्र सामना में कांग्रेस को 'कुढ़ने वाला' और 'मतलबी' कहा गया है. सामना में ठाकरे गुट ने लिखा, 'विधान परिषद के आगामी चुनाव के लिए उद्धव ठाकरे जो नाम देंगे, उसे हमारा समर्थन रहेगा, ऐसी भूमिका शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) द्वारा लिए जाने के कारण महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल नाराज हो गए.  उनका कहना है कि ‘चर्चा होनी चाहिए. हमारा दल MVA में दूसरे नंबर पर है.'सामना में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पर कटाक्ष करते हुए लिखा गया, 'हां, यह सच है कि चर्चा होनी चाहिए, लेकिन कांग्रेस पार्टी में चर्चा किससे होनी चाहिए? राज्यसभा चुनाव के समय राज्य का कांग्रेस नेतृत्व कोई भी निर्णय लेने की स्थिति में नहीं था. वो भी शिवसेना की तरह राज्यसभा चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन हाईकमान ने शरद पवार की उम्मीदवारी को समर्थन दिया, ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष को दिल्ली जाकर अपने हाईकमान से कुछ सवाल पूछने चाहिए.'

    छोटे दलों का सम्मान करने की सलाह

    सामना में कांग्रेस को छोटे दलों को सम्मान देने की सलाह दी गई है. इसमें लिखा है, 'लोकसभा में कांग्रेस को 100 सीटें मिलीं और राहुल गांधी सम्मान के साथ विपक्ष के नेता बने. इसमें महाराष्ट्र द्वारा जीती गईं 30 सीटों की बड़ी भूमिका है. 48 में से 30 सीटें MVAने जीतीं और उसमें13 सीटें कांग्रेस ने जीतीं. राज्य के क्षेत्रीय दलों को महत्व दिया जाए तो कांग्रेस को भी अच्छी सफलता मिलती है. यही लोकसभा के परिणामों में देखने को मिला, लेकिन ‘13’ सीटों की सफलता के कारण कांग्रेस द्वारा विधानसभा चुनाव में आखिरी समय तक जरूरत से ज्यादा खींचतान करने का खामियाजा गठबंधन को भुगतना पड़ा.इसमें कहा गया है कि शिवसेना (UBT) कांग्रेस का राष्ट्रीय स्तर पर साथ देगी, लेकिन कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों का इस्तेमाल केवल सहयोगी बैसाखियों के रूप में नहीं करना चाहिए. कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों को भी  समान भागीदार के रूप में सम्मान देना ही चाहिए, क्योंकि क्षेत्रीय दल  स्थानीय मुद्दों के लिए लाउडस्पीकर की तरह हैं. केंद्र की चाह रखने वालों को प्रादेशिक दलों को मिलनेवाले ‘अवसर’ की ओर उन्हें लालची नजरों से नहीं देखना चाहिए.

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