सर्वोच्च अदालत की 9 जजों की बेंच 22 अप्रैल तक 50 से अधिक याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई करेगी। दरअसल सुनवाई सुबह 10:30 बजे सबरीमाला रिव्यू केस से शुरू होगी। रिव्यू पिटीशनर और उनके समर्थक 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक अपनी दलीलें रखेंगे, जबकि फैसले का विरोध करने वाले पक्ष 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक अपना पक्ष रखेंगे।दरअसल सुप्रीम कोर्ट जिन पांच बड़े मुद्दों पर सुनवाई करेगा, उनमें पहला मुद्दा सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का है। अदालत यह तय करेगी कि क्या सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश का अधिकार है। साल 2018 में इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम स्टेट ऑफ केरल मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 10 से 50 साल की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। इस फैसले के खिलाफ मंदिर के पुजारी समेत कई संगठनों ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की है।
जानिए प्रमुख मामले क्या है?
दूसरा मुद्दा दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं के खतना की प्रथा से जुड़ा है। 2017 में एडवोकेट सुनीता तिवारी ने इस प्रथा को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी और इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया था। तीसरा मुद्दा मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश का है। 2016 में यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में नमाज पढ़ने का अधिकार देने की मांग की थी।
चौथा मुद्दा पारसी महिलाओं के अग्निमंदिर में प्रवेश से जुड़ा है। 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने एक हिंदू व्यक्ति से शादी करने के बाद पारसी धार्मिक स्थलों में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पांचवां मुद्दा मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के सवालों का है। अदालत यह तय करेगी कि क्या व्यक्तिगत कानूनों को मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परखा जा सकता है।
पिछली सुनवाई में क्या हुआ था?
वहीं इस मामले की पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सात अहम सवाल तय किए थे। 13 जनवरी 2020 को अदालत ने स्पष्ट किया था कि वह केवल पुनर्विचार याचिकाओं पर ही नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 14 (समानता) के बीच संतुलन जैसे बड़े संवैधानिक मुद्दों पर भी विचार करेगी। जनवरी 2020 में हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने महिलाओं के बहिष्कार को असंवैधानिक बताया था, जबकि धार्मिक पक्षों ने आस्था और अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देते हुए न्यायिक हस्तक्षेप सीमित रखने की मांग की थी। बाद में कोविड-19 महामारी के कारण सुनवाई रोक दी गई थी।अगर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच पहले के फैसलों को बरकरार रखती है, तो भविष्य में धार्मिक मामलों में अदालत के हस्तक्षेप की सीमा भी तय हो सकती है।
क्या है पूरा विवाद?
सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लंबे समय से विवाद रहा है। इसके पीछे मुख्य वजह मासिक धर्म को लेकर धार्मिक मान्यताएं बताई जाती हैं। मान्यता है कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं और इसी कारण एक निश्चित आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती थी।
यह विवाद 1990 में मंदिर में महिला प्रवेश के मुद्दे से शुरू हुआ था। समय के साथ यह मामला स्थानीय अदालतों से होता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया था कि सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह प्रतिबंध असंवैधानिक है। इस फैसले के बाद भारी विरोध के बीच दो महिलाएं बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी मंदिर में प्रवेश करने में सफल हुई थीं।
इसके बाद 2019 में सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने इस मामले को 9 जजों की बेंच को भेज दिया था और इसी केस के साथ अन्य धर्मों में महिलाओं से जुड़े मामलों को भी जोड़ दिया गया था।
इस मामले पर अलग-अलग पक्षों की राय भी सामने आई है। केंद्र सरकार ने शुरुआत में महिलाओं के प्रवेश का समर्थन किया था और कहा था कि लैंगिक समानता के खिलाफ कोई भी प्रथा नहीं होनी चाहिए। हालांकि बाद में केंद्र ने कहा कि यह व्यापक संवैधानिक प्रश्न है और इसका फैसला संविधान पीठ को करना चाहिए।
अखिल भारतीय संत समिति का कहना है कि अदालतों को धार्मिक मामलों में तभी हस्तक्षेप करना चाहिए जब वे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ हों। वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का मानना है कि अदालतों को यह तय करने से बचना चाहिए कि कौन-सी धार्मिक प्रथा जरूरी है।
गौरतलब है कि 2018 के फैसले के बाद बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी के मंदिर में प्रवेश करने के बाद पुजारियों ने पूरे मंदिर का शुद्धीकरण किया था। इसके साथ ही केरल के कई इलाकों में इस फैसले के विरोध में बड़े प्रदर्शन भी हुए थे।


