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    Homeराज्यमध्यप्रदेशमुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने “74 वर्ष बाद” पुस्तक का किया विमोचन

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने “74 वर्ष बाद” पुस्तक का किया विमोचन

    भोपाल।  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रविवार को समत्व भवन, मुख्यमंत्री निवास में क्रिकेटर और केरल के कोच श्री अमय खुरासिया द्वारा लिखित हिन्दी पुस्तक " 74 वर्ष बाद" का विमोचन किया। इस दौरान श्री अमय खुरासिया की बेटी और पुस्तक की सह-लेखिका अमयसी कीर्ति खुरासिया भी उपस्थित थीं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने श्री अमय खुरासिया और सह-लेखिका अमयसीकीर्ति खुरासिया को बधाई दी। यह पुस्तक अंग्रेजी भाषा में भी लिखी गई है। अमयसीकीर्ति खुरासिया श्री अमय खुरासिया की बेटी हैं और इन्फ्लुएंसर हैं। 

    यह पुस्तक भगवान श्रीकृष्ण के गीता में दिए उपदेशों और युद्ध नीतियों की वर्तमान दौर में उपयोगिता पर आधारित है। श्री खुरासिया ने कोच के रूप में गीता और भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों का प्रयोग क्रिकेट टीम की रणनीति बनाने में किया। इसके फलस्वरूप केरल राज्य की टीम ने रणजी ट्रॉफी के इतिहास में 74 वर्ष में पहली बार फाइनल तक का सफर तय किया। दिलीप ट्रॉफी जैसे देश के प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में पहली बार केरल के छह खिलाड़ी एक साथ चुने गए। इस पुस्तक के संदर्भ में बीसीसीआई के पूर्व सचिव श्री संजय जगदाले, भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान श्री अनिल कुंबले, श्री राहुल द्रविड़, श्री वीवीएस लक्ष्मण, श्री संजय बांगर, श्रीलंका के पूर्व कप्तान श्री दिलीप मेंडिस, सहित पद्मश्री से सम्मानित दक्षिण भारतीय अभिनेता श्री मोहनलाल ने भी अपना अभिमत व्यक्त किया हैं।

    श्री खुरासिया ने बताया कि आध्यात्म भारतीय संस्कारों में डीएनए की तरह घुला-मिला है। हम जब भी विचलित होते हैं तो अपने धार्मिक स्थल जाते हैं और मानसिक शांति लेकर लौटते हैं। यह उस युद्ध पर विजय होती है, जो हम अपने अंदर लड़ रहे होते हैं। गीता का निष्काम कर्म सिद्धांत युद्धनीति की सबसे बड़ा उदाहरण है। योद्धा से अपेक्षा की जाती है कि वह व्यक्तिगत राग-द्वेष से परे, केवल कर्तव्य भाव से युद्ध करे। अर्जुन श्रेष्ठ धर्नुधर था, लेकिन कुरुक्षेत्र में वह अंर्तद्वंद में उलझा था। वह यह तय नहीं कर पा रहा था कि आखिर उसे लड़ना क्यों है? यह ऐसी स्थिति थी मानो किसी टीम में योग्य खिलाड़ी हों, लेकिन उन्हें अपना आत्मबल, अपना उद्देश्य ही स्पष्ट न हो। फिर बल्ला हाथ में होते हुए भी किसी काम का नहीं होता। वासुदेव कृष्ण वे गुरू थे जिन्होंने अर्जुन को आंतरिक द्वंद से बाहर निकालते हुए स्वयं के सामर्थ्य से और उद्देश्य से परिचय कराया। ऐसे ही चंद्रगुप्त मौर्य को आचार्य चाणक्य ने प्रतापी राजा बनाया। दुनिया जीतने वाले जितने भी महान योद्धा हुए हैं, उन सभी के पीछे योग्य गुरू खड़े नजर आते हैं। आज के दौर में पाश्चात्य संस्कृति की ओर आकर्षण बढ़ रहा है, जबकि भारतीय सनातन ज्ञान परंपरा बेहद समृद्ध है। मैंने केरल राज्य के कोच के रूप में भारतीय आध्यात्मिक ग्रंथों और युद्ध नीतियों का इस्तेमाल किया। यह प्रयास था भारतीय सनातन संस्कारों के प्रति देश-दुनिया में विश्वास स्थापित करने का। इस पुस्तक में क्रिकेट के मैचों के दौरान उन तमाम घटनाओं का उल्लेख है, जिनसे निपटने के लिए मैंने प्राचीन युद्ध नीतियों और गुरुओं के सिद्धातों का इस्तेमाल किया।

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