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    पृथ्वी दिवस: एक चेतावनी,हम नहीं बदले तो पेट्रोल से महंगा होगा पानी

    पृथ्वी दिवस : जल है तो कल है पर कल के लिए आज क्या कर रहे हैं हम
    पृथ्वी दिवस 22 अप्रैल पर विशेष

    राजेश रवि , वरिष्ठ पत्रकार

    हर वर्ष 22 अप्रैल को दुनिया भर में पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। इस दिन की शुरुआत 1970 में अमेरिका से हुई थी, जब सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन ने पर्यावरण के प्रति बढ़ती उदासीनता के विरुद्ध जन-जागरण का आह्वान किया था। उस वर्ष दो करोड़ से अधिक अमेरिकी नागरिक सड़कों पर उतरे और इस आंदोलन ने एक वैश्विक चेतना को जन्म दिया। आज यह दिवस 193 से अधिक देशों में मनाया जाता है। लेकिन एक कड़वा सत्य यह भी है कि जिस उद्देश्य के लिए यह दिन आरंभ हुआ था । पृथ्वी को बचाने का संकल्प । वह उद्देश्य आज भी अधूरा है। बल्कि स्थिति और विकट होती जा रही है। पृथ्वी दिवस अब उत्सव नहीं, एक गंभीर चेतावनी बन चुका है।

    चिंता भविष्य की
    चिंता भविष्य की

    आज के समय में पृथ्वी दिवस मनाना केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है। सरकारें संकल्प लेती हैं, मंचों पर भाषण होते हैं, पौधे लगाए जाते हैं और अगले दिन सब कुछ भूल जाता है। लेकिन इस बार हमें इस दिन को एक गहरी चेतावनी के रूप में देखना होगा। यह चेतावनी है जल संकट की, नदियों के मरने की, पहाड़ों के उजड़ने की और उस सभ्यता के अंत की, जो पानी के बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकती।

    पानी पर नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर चुके जल पुरुष राजेंद्र सिंह को अक्सर अपने संबोधन में यह कहते हुए सुना जाता है कि अगर आज की गति से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जारी रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब पानी की कीमत पेट्रोल से अधिक होगी। यह कोई काल्पनिक भविष्यवाणी नहीं है। दुनिया के कई देशों में यह स्थिति आंशिक रूप से आ भी चुकी है। भारत में भी जल संकट की आहट स्पष्ट सुनाई दे रही है।

    नदियां मर रही हैं और हम मूकदर्शक बने हैं

    भारत एक नदी-सभ्यता का देश है। यहां की संस्कृति, कृषि, धर्म और दर्शन सब कुछ नदियों के किनारे पला-बढ़ा है। सिंधु, गंगा, यमुना, सरस्वती इन नदियों ने सहस्राब्दियों तक इस देश को जीवन दिया। लेकिन आज देश की हजारों नदियां या तो सूख चुकी हैं या नाले में तब्दील हो चुकी हैं। यह केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है यह एक सभ्यतागत संकट है।

    कहते हैं कि जब कोई नदी सूखती है, तो उसके किनारे की सभ्यता भी दम तोड़ देती है। इतिहास इसका गवाह है। सरस्वती नदी के सूखने के साथ ही सिंधु-सरस्वती सभ्यता का पतन हुआ। आज हम उसी मार्ग पर चल रहे हैं आंखें खुली हैं, पर देख नहीं रहे।

    पहाड़ और नदियों का संबंध अटूट है। जब पहाड़ों पर वनों की कटाई होती है, जब पहाड़ नंगे होते हैं, तो वर्षा जल बह जाता है। पहाड़ ही वे स्रोत हैं जो नदियों को जीवन देते हैं। पर आज देश में पहाड़ों पर खनन हो रहा है, जंगल उजाड़े जा रहे हैं। अरावली जैसी पर्वत श्रृंखला जो उत्तर भारत की ढाल है, जो थार के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकती है उस पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली को लेकर जो नई परिभाषा स्वीकार की, उसका देशभर में तीव्र विरोध हुआ। जनता की आवाज इतनी प्रबल थी कि न्यायालय को बाद में उसी आदेश पर रोक लगानी पड़ी। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि कहीं न कहीं सरकारों, राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों ने सामूहिक भविष्य की बजाय निजी हितों को प्राथमिकता दी। लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति अत्यंत खतरनाक है।

    जन-प्रयास से जीवित हुई नदियां , एक उम्मीद की किरण

    निराशा के इस घटाटोप अंधेरे में कुछ उजालों की बात भी करनी होगी। राजस्थान के अलवर जिले में तरुण भारत संघ जैसी संस्था ने साबित किया है कि अगर इरादा हो तो मरी हुई नदियों को भी पुनर्जीवित किया जा सकता है। राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में पिछले कुछ दशकों में इस संस्था ने राजस्थान की अरवरी नदी, कर्नाटक की होल कोठी और चंबल क्षेत्र की अनेक नदियों के जल-ग्रहण क्षेत्रों में सैकड़ों छोटे बांध और तालाब बनाए। परिणाम चमत्कारिक रहा । सूखी नदियां फिर बहने लगीं, खेत लहलहाए, गांव समृद्ध हुए।

    यह कोई जादू नहीं था । यह था पारंपरिक जल-प्रबंधन का ज्ञान, सामुदायिक भागीदारी और अटूट संकल्प का संयोग। इन उदाहरणों से सीखकर अगर सरकारें नीतियां बनाएं और नागरिक अपना दायित्व समझें, तो देशभर में यह संभव है।

    संविधान क्या कहता है और हम क्या कर रहे हैं?

    भारतीय संविधान में पर्यावरण संरक्षण की व्यवस्था स्पष्ट रूप से की गई है। अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार को मौलिक अधिकार मानता है, और न्यायालयों ने इसकी व्याख्या करते हुए स्वच्छ पर्यावरण को भी इसी अधिकार का हिस्सा माना है। अनुच्छेद 48-ए राज्य को यह निर्देश देता है कि वह पर्यावरण की रक्षा करे, वनों और वन्यजीवों का संरक्षण करे। अनुच्छेद 51-ए (जी) नागरिकों का मौलिक कर्तव्य निर्धारित करता है कि वे प्राकृतिक पर्यावरण वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों की रक्षा करें और उनका संवर्धन करें।

    लेकिन विडंबना देखिए न तो सरकारें अपने संवैधानिक दायित्व का पालन कर रही हैं और न ही नागरिक अपने मौलिक कर्तव्य को याद रखते हैं। हम सरकार पर उंगली उठाते हैं, पर स्वयं पानी की बर्बादी करते हैं। हम नदियों में प्रदूषण की शिकायत करते हैं, पर उसी नदी में कचरा भी फेंकते हैं। लोकतंत्र में लोक का दायित्व उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना सरकार का। जब तक हम अपने मौलिक कर्तव्यों को नहीं निभाएंगे, केवल अधिकारों की मांग करने से बात नहीं बनेगी।

    शहरीकरण और जल संकट , एक अनदेखा रिश्ता

    आज देश में तेजी से बढ़ता शहरीकरण जल संकट का एक बड़ा कारण बन रहा है। गांवों में रोजगार न होने के कारण लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इससे शहरों पर जल-आपूर्ति का दबाव असहनीय होता जा रहा है। शहरों में भूमिगत जल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है। कंक्रीट के जंगलों में वर्षा जल धरती में नहीं उतरता — नालों से बहकर समुद्र में मिल जाता है।

    प्रकृति का एक अद्भुत संतुलन है । जहां जनसंख्या अधिक है, वहां प्रकृति ने वर्षा भी पर्याप्त दी है। समस्या वितरण और प्रबंधन की है, न कि प्रकृति की कंजूसी की। अगर हम वर्षा जल को संरक्षित करें, धरती के भीतर पहुंचाएं, तो जल की कमी नहीं रहेगी। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि सरकार ऐसी नीतियां बनाए जिससे गांवों में ही रोजगार सृजित हो। जब गांव समृद्ध होंगे, शहरों की ओर पलायन रुकेगा, और शहरी जल संकट भी स्वतः कम होगा।

    सूखे और बाढ़ का बदलता स्वरूप

    एक और चिंताजनक बात यह है कि सूखे और बाढ़ का भूगोल बदल रहा है। पहले राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्से अकाल-प्रभावित माने जाते थे। लेकिन अब यह चित्र बदल रहा है। जो क्षेत्र पहले जल-समृद्ध थे, वे अब सूखे की चपेट में आ रहे हैं, और जो क्षेत्र सूखे के लिए जाने जाते थे, वहां असामान्य बाढ़ आ रही है। यह जलवायु परिवर्तन का सीधा परिणाम है और इसके लिए जिम्मेदार हैं हमारी बदली हुई आदतें, हमारा प्रकृति के साथ बिगड़ता रिश्ता।

    अब क्या करें , एक व्यावहारिक दिशा

    पृथ्वी दिवस पर केवल समस्याओं की सूची गिनाना पर्याप्त नहीं। समाधान की दिशा में भी सोचना होगा। सरकार को चाहिए कि नदियों के जल-ग्रहण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और जल-संरक्षण संरचनाएं बनाई जाएं। शहरी क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन को अनिवार्य किया जाए। पहाड़ों पर खनन पर कठोर नियंत्रण हो। नदियों को कानूनी व्यक्तित्व देने की दिशा में आगे बढ़ा जाए । नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। घर में पानी की बर्बादी रोकें। वर्षा जल को संचित करें। अपने मोहल्ले की नदी, तालाब या झील की सफाई में भागीदार बनें। पेड़ लगाएं और उन्हें बचाएं भी।

    लोकतंत्र में लोक का दायित्व

    पृथ्वी दिवस हमें याद दिलाता है कि यह धरती हमारी नहीं हम इसके हैं। हमने इसे अपने पूर्वजों से विरासत में नहीं पाया । हमने इसे उधार लिया है। और अगर हमने यह उधार नहीं लौटाया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।लोकतंत्र में लोक को अपना दायित्व नहीं भूलना चाहिए। पानी के लिए, पहाड़ों के लिए, नदियों के लिए आज आवाज उठानी होगी। न डर से, न औपचारिकता से बल्कि उस गहरी जिम्मेदारी के बोध से जो हर नागरिक को होनी चाहिए।

    इस पृथ्वी दिवस पर संकल्प लें : केवल भाषण का नहीं, बदलाव का। क्योंकि जल है तो कल है और कल के लिए आज ही काम करना होगा।

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