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    डॉक्टर की सलाह: अस्थमा फैमिली हिस्ट्री में हो तो बच्चों का रखें खास ख्याल

    आनुवांशिक है अस्थमा? घबराएं नहीं, सही समय पर बचाव से सुरक्षित रह सकते हैं बच्चे

    सांस हमारे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है, लेकिन बदलती जीवनशैली और पर्यावरण में बढ़ते प्रदूषण ने हमारे श्वसन तंत्र पर हमला तेज कर दिया है। आज के दौर में न केवल बुजुर्ग, बल्कि छोटे बच्चे भी अस्थमा जैसी गंभीर बीमारी का शिकार हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अस्थमा में 'जेनेटिक्स' यानी आनुवांशिकता की बड़ी भूमिका होती है, लेकिन जागरूकता और सही सावधानी से बच्चों को इस खतरे से बचाया जा सकता है।

    कितना है आनुवांशिक जोखिम?

    शोध बताते हैं कि यदि माता-पिता में से कोई एक अस्थमा से पीड़ित है, तो बच्चे में इसका जोखिम 25-30% होता है। यदि माता-पिता दोनों ही इसके शिकार हैं, तो यह खतरा बढ़कर 60-75% तक पहुँच जाता है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि जोखिम होने का मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चा निश्चित रूप से इस बीमारी की चपेट में आएगा ही।

    सिर्फ जेनेटिक्स ही नहीं, ये भी हैं जिम्मेदार

    अस्थमा होने का एकमात्र कारण परिवार का इतिहास नहीं है। कई बाहरी कारक भी स्वस्थ व्यक्ति को इसका मरीज बना सकते हैं:

    • प्रदूषण और एलर्जी: धूल-मिट्टी, पालतू जानवरों के रोएं और फफूंदी (Mold) शरीर को संवेदनशील बना देते हैं।

    • धूम्रपान: घर में किसी सदस्य द्वारा किया गया धूम्रपान (सेकेंड हैंड स्मोकिंग) बच्चों के फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचाता है।

    • मोटापा: अधिक वजन भी फेफड़ों की कार्यक्षमता को प्रभावित कर अस्थमा का खतरा बढ़ा देता है।

    बच्चों को सुरक्षित रखने के प्रभावी उपाय

    यदि आपके परिवार में अस्थमा का इतिहास है, तो बच्चों के लिए ये सावधानियां बरतें:

    1. धुएं से दूरी: बच्चों को सिगरेट या अन्य धुएं वाले स्थानों से पूरी तरह दूर रखें।

    2. एलर्जी पर नियंत्रण: घर को धूल-मुक्त रखें और उन चीजों की पहचान करें जिनसे बच्चे को एलर्जी हो सकती है।

    3. फेफड़ों की मजबूती: बच्चों को नियमित शारीरिक व्यायाम के लिए प्रेरित करें। फिजिकल एक्टिविटी फेफड़ों को मजबूत बनाती है।

    4. समय पर वैक्सीनेशन: बच्चों को फ्लू और निमोनिया जैसे संक्रमणों से बचाने के लिए समय पर टीके लगवाएं, क्योंकि ये संक्रमण अस्थमा को ट्रिगर कर सकते हैं।

    5. पीडियाट्रिशियन की सलाह: किसी भी लक्षण का इंतजार करने के बजाय, पहले ही डॉक्टर से मिलकर बचाव की योजना तैयार करें।

    शुरुआती लक्षणों पर दें ध्यान

    यदि बच्चा लगातार खांस रहा है, उसे सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज (Wheezing) आ रही है या खेलकूद के दौरान जल्दी थक रहा है, तो इसे नजरअंदाज न करें। शुरुआती चरण में ही डॉक्टरी सलाह और उचित उपचार से इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है।

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