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    खर्चों पर कंट्रोल का असर: 5.6 लाख करोड़ रुपये की बचत से बदलेगी देश की दिशा

    आयात बोझ कम करने के लिए व्यवहारिक बदलाव की जरूरत

    नई दिल्ली। ईरान संकट के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आ रहे उछाल ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इस संकट से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से पेट्रोल-डीजल के संयमित उपयोग, सोने की खरीद टालने और विदेश यात्राओं में कटौती करने का आग्रह किया है। आर्थिक विश्लेषणों के अनुसार, यदि देश इन अपीलों पर गंभीरता से अमल करता है, तो भारत एक वर्ष के भीतर लगभग 59.2 अरब डॉलर यानी करीब 5.6 लाख करोड़ रुपये की विशाल विदेशी मुद्रा बचाने में सक्षम हो सकता है। यह अनुमान वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान कच्चा तेल, सोना, उर्वरक और खाद्य तेल के आयात पर हुए भारी खर्च के आंकड़ों पर आधारित है।

    ईंधन और स्वर्ण आयात में कटौती से मिलेगी बड़ी राहत भारत सरकार का प्राथमिक लक्ष्य ईंधन की खपत में कम से कम 20 प्रतिशत तक की कमी लाना है, जिससे सालाना 27 अरब डॉलर की सीधी बचत संभव है। कच्चे तेल के आयात पर भारत ने बीते वित्त वर्ष में 135 अरब डॉलर खर्च किए हैं, जो अर्थव्यवस्था पर बड़ा बोझ है। इसी तरह सोने के प्रति भारतीयों के गहरे लगाव के कारण बीते वर्ष 72 अरब डॉलर का सोना आयात किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सोने की मांग में मात्र 10 प्रतिशत की भी गिरावट आती है, तो देश को 7.2 अरब डॉलर की अतिरिक्त बचत होगी। हालांकि, सांस्कृतिक और निवेश संबंधी कारणों से सोने की मांग को कम करना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, लेकिन वर्तमान आर्थिक स्थितियों को देखते हुए इसमें संयम आवश्यक हो गया है।

    बढ़ता व्यापार घाटा और भविष्य की आर्थिक रणनीति आंकड़े बताते हैं कि भारत का स्वर्ण आयात बिल पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है, जो वित्त वर्ष 2022-23 के 35 अरब डॉलर से बढ़कर अब 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इस बेतहाशा वृद्धि ने व्यापार घाटे को 333.2 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंचा दिया है, जिससे चालू खाता घाटा भी प्रभावित हो रहा है। सरकार की योजना केवल तेल और सोने तक सीमित नहीं है, बल्कि खाद्य तेल में 10 प्रतिशत और उर्वरक आयात में 50 प्रतिशत की कटौती कर क्रमशः 1.95 अरब डॉलर और 7.3 अरब डॉलर बचाने की भी है। इसके अतिरिक्त, विदेशी यात्राओं पर खर्च होने वाले 15.8 अरब डॉलर को रोककर विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती प्रदान की जा सकती है ताकि वैश्विक अस्थिरता के समय रुपया और देश की अर्थव्यवस्था सुरक्षित रहे।

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