कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के चौंकाने वाले नतीजों के बाद राज्य के राजनीतिक गलियारों में चुनावी गठबंधन की अहमियत को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों और जानकारों के बीच अब यह बड़ा सवाल तैर रहा है कि यदि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने समय रहते कांग्रेस और वामदलों के साथ सीटों का तालमेल कर लिया होता, तो क्या आज सूबे की राजनीतिक तस्वीर कुछ और होती?
वोटों के बिखराव से टीएमसी को भारी नुकसान
हालिया चुनावी आंकड़ों के गहन विश्लेषण से यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ पड़ने वाले सत्ता विरोधी वोटों के बिखराव का सबसे सीधा और बड़ा नुकसान तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को भुगतना पड़ा है। जमीनी रिपोर्टों के मुताबिक, राज्य की एक दर्जन से अधिक सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी को जितने वोट मिले, वह संख्या टीएमसी और भाजपा के बीच हार-जीत के अंतर से कहीं अधिक थी। राजनीतिक पंडितों का अनुमान है कि मतों के इसी विभाजन के कारण तृणमूल कांग्रेस को करीब तीन दर्जन सीटों का भारी नुकसान उठाना पड़ा।
विधानसभा की दलीय स्थिति और भाजपा की बढ़त
पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यीय विधानसभा में इस बार तृणमूल कांग्रेस महज 80 सीटों पर सिमट कर रह गई है। इसके विपरीत, भाजपा ने रिकॉर्ड 207 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज करके राज्य में एक बहुत बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। इस त्रिकोणीय मुकाबले में कांग्रेस को केवल दो और वाममोर्चा (लेफ्ट) को महज एक सीट से संतोष करना पड़ा, लेकिन दोनों दलों को मिले वोट प्रतिशत ने यह साबित कर दिया कि विपक्ष में एकजुटता की कमी ही भाजपा की प्रचंड जीत का मुख्य आधार बनी।
मुस्लिम बहुल इलाकों में बदला समीकरण
इस चुनाव का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में देखने को मिला। साल 2021 के विधानसभा चुनाव में ये इलाके टीएमसी के सबसे मजबूत गढ़ माने जाते थे, लेकिन इस बार वोटों के त्रिकोणीय बंटवारे का फायदा सीधे तौर पर भाजपा को मिला। इन क्षेत्रों की कुल 43 सीटों में से भाजपा अकेले 20 सीटें झटकने में कामयाब रही, जिसने टीएमसी के पारंपरिक समीकरणों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।
रणनीतिक तालमेल की जरूरत पर बल
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद वामपंथियों (लेफ्ट) के पास अब भी करीब 7 प्रतिशत का एक निश्चित वोट बैंक मौजूद है। ऐसे में यदि टीएमसी, कांग्रेस और लेफ्ट के बीच एक मजबूत रणनीतिक गठबंधन हुआ होता, तो बंगाल का पूरा चुनावी गणित पलट सकता था। बहरहाल, इन नतीजों ने देश के समूचे विपक्ष को एक साफ और कड़ा संदेश दे दिया है कि विपक्ष का बिखराव अंततः भाजपा के लिए विजय का मार्ग प्रशस्त करता है।


