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    एयरलाइन सेक्टर में बदलाव, Air India और IndiGo ने कम कीं घरेलू फ्लाइट्स

    नई दिल्ली: एविएशन सेक्टर में गहराते वित्तीय संकट को देखते हुए देश की दो सबसे बड़ी एयरलाइंस, एअर इंडिया (Air India) और इंडिगो (IndiGo) ने एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया है। ये दोनों विमानन कंपनियां आगामी 1 जून से अपनी घरेलू उड़ानों की संख्या (फ्लाइट कैपेसिटी) में कटौती करने जा रही हैं। यह नई व्यवस्था अगले तीन महीनों तक प्रभावी रहेगी, जिसके कारण आगामी दिनों में हवाई सफर करने वाले यात्रियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है और टिकटें महंगी होने की भी आशंका है।

    ईंधन के आसमान छूते दाम और ईरान-अमेरिका जंग बनी मुख्य वजह

    विमानन क्षेत्र से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, उड़ानों में इस कटौती की सबसे बड़ी वजह एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) यानी हवाई ईंधन की कीमतों में आया रिकॉर्ड उछाल है। दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। चूंकि किसी भी एयरलाइंस के कुल संचालन खर्च का एक बड़ा हिस्सा ईंधन पर ही व्यय होता है, इसलिए एटीएफ की बढ़ती लागत ने कंपनियों के मुनाफे और रोजाना के ऑपरेशनल बजट पर भारी दबाव डाल दिया है।

    छुट्टियां खत्म होने के बाद मौसमी मंदी से निपटने की तैयारी

    ईंधन संकट के अलावा, इस फैसले के पीछे एक और वजह गर्मियों की छुट्टियां खत्म होने के बाद आने वाली 'सीजनल मंदी' (विमानन क्षेत्र में यात्रियों की कमी का दौर) भी है। जून के महीने में स्कूल-कॉलेज दोबारा खुलने के बाद आमतौर पर लोग हवाई यात्राएं कम करते हैं। इस सुस्त अवधि में खाली सीटें लेकर उड़ान भरने के बजाय एयरलाइंस अपनी उड़ानों को सीमित कर वित्तीय नुकसान को कम करने की रणनीति पर काम कर रही हैं।

    एअर इंडिया 15% और इंडिगो 7% तक कम करेगी अपनी उड़ानें

    लागत को नियंत्रित करने के लिए दोनों कंपनियों ने अलग-अलग योजनाएं तैयार की हैं। सरकारी से निजी हाथों में गई एअर इंडिया अपने घरेलू रूटों पर उड़ानों के संचालन में करीब 15 फीसदी तक की बड़ी कटौती करेगी। दूसरी तरफ, देश की सबसे बड़ी बजट एयरलाइंस इंडिगो भी अपनी सेवाओं को 5 से 7 प्रतिशत तक कम करने का मन बना चुकी है। दोनों ही कंपनियां इस मंदी के दौर में अपने विमानों और स्टाफ के खर्चों को री-शेड्यूल (अनुकूलित) कर रही हैं।

    यात्रियों को झेलनी पड़ सकती है परेशानी, वित्तीय दबाव में एयरलाइंस

    कंपनियों के इस संयुक्त कदम से जहां एक तरफ उन्हें अपने बढ़ते खर्चों को काबू करने और आर्थिक नुकसान से बचने में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी तरफ यात्रियों के लिए विकल्प सीमित हो जाएंगे। अचानक उड़ानों की संख्या घटने से आखिरी वक्त में टिकट बुक कराने वाले यात्रियों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ना तय माना जा रहा है। विमानन विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम स्थिर नहीं होते, तब तक एयरलाइंस पर यह वित्तीय दबाव बना रहेगा।

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