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    महाराष्ट्र में 45 करोड़ रुपये के ट्रांजैक्शन पर चर्चा, बैंक का जवाब आया

    मुंबई: भारत के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंक, एचडीएफसी बैंक (HDFC Bank) ने मीडिया में चल रही उन खबरों का पूरी तरह से खंडन किया है, जिनमें ₹45 करोड़ के ट्रांजैक्शन में गड़बड़ी की बात कही जा रही थी। बुधवार को बैंक ने आधिकारिक रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि उसकी आंतरिक निगरानी, ऑडिट और नियंत्रण प्रणालियां पूरी तरह मजबूत, पारदर्शी और सुरक्षित हैं। हालांकि, इस स्पष्टीकरण के बाद भी शेयर बाजार में निवेशकों के बीच घबराहट दिखी और दोपहर 1:45 बजे तक बैंक के शेयर 2.45% की गिरावट के साथ ₹759.80 पर आ गए, जिससे कॉर्पोरेट गवर्नेंस को लेकर बहस तेज हो गई है।

    क्या है पूरा विवाद? सरकारी एजेंसी को मार्केटिंग खर्च के नाम पर भुगतान का आरोप

    आंतरिक दस्तावेजों के हवाले से दावा किया जा रहा था कि बैंक की ऑडिट कमेटी ने एक सरकारी कंपनी को किए गए ₹45 करोड़ के भुगतान की आंतरिक सतर्कता (Vigilance) जांच के आदेश दिए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, यह रकम महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम (MSRDC) को दी जानी थी, जो कि जमा राशि पर तय दर से ज्यादा ब्याज (इंटरेस्ट डिफरेंशियल) का हिस्सा थी। लेकिन आरोप है कि इस राशि को सीधे ब्याज के रूप में देने के बजाय, मार्केटिंग विभाग का खर्च दिखाकर चार स्थानीय वेंडर्स के माध्यम से 'सड़क सुरक्षा जागरूकता अभियान' के नाम पर घुमाकर (रूट करके) दिया गया। वित्तीय वर्ष 2025 के आंतरिक ऑडिट में इस पर आपत्ति जताते हुए विभाग के काम को 'असंतोषजनक' बताया गया था।

    शीर्ष प्रबंधन पर उंगली: पूर्व चेयरमैन के इस्तीफे और एमडी की भूमिका पर सवाल

    रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि यह संदिग्ध लेनदेन 18 मार्च को बैंक के पूर्व अध्यक्ष अतनु चक्रवर्ती के पद छोड़ने से कुछ दिन पहले ही हुआ था। आंतरिक जांच के रिकॉर्ड बताते हैं कि इस भुगतान को एमडी और सीईओ शशिधर जगदीशन की मौजूदगी में हुई एक हाई-लेवल मीटिंग के दौरान मौखिक सहमति मिली थी। जांच के दौरान कई अधिकारियों और मुख्य विपणन अधिकारी (CMO) रवि संथानम ने कथित तौर पर यह माना कि मार्केटिंग विभाग ने इस अतिरिक्त ब्याज को विज्ञापन खर्च के रूप में छिपाने के लिए एक 'सुविधाप्रदाता' की तरह काम किया था ताकि MSRDC को मुआवजा दिया जा सके।

    आरबीआई के नियमों और भ्रष्टाचार विरोधी नीति के उल्लंघन का दावा

    इस मामले को लेकर बैंकिंग रेगुलेटर के नियमों पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। यह कथित तौर पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के उन मास्टर निर्देशों का सीधा उल्लंघन है, जो बैंकों को किसी खास जमाकर्ता के साथ बातचीत करके अलग से ज्यादा ब्याज दर देने से रोकते हैं। वेंडर्स के जरिए इस पैसे को रूट करना एक तरह से किसी एक ग्राहक को विशेष फायदा पहुँचाने जैसा है। इसके अलावा, विश्लेषकों का कहना है कि यह कृत्य बैंक की अपनी 'रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार विरोधी नीति' (Anti-Bribery and Anti-Corruption Policy) के भी खिलाफ है, जो किसी भी तरह के अनुचित प्रलोभन या वित्तीय हेरफेर को प्रतिबंधित करती है।

    बैंक का पक्ष: चुनिंदा तथ्यों के आधार पर लगाए गए आरोप गलत

    इन तमाम गंभीर आरोपों पर कड़ा रुख अपनाते हुए एचडीएफसी बैंक के प्रवक्ता ने कहा कि चुनिंदा जानकारियों को तोड़-मरोड़ कर पेश किए जा रहे दावों और गलतियों के आरोपों को बैंक पूरी तरह खारिज करता है। बैंक प्रशासन का कहना है कि उनके यहाँ हर मुद्दे को तय मानकों और स्थापित प्रक्रियाओं के तहत ही सुलझाया जाता है और किसी भी आंतरिक समीक्षा का फैसला पूरी छानबीन के बाद ही होता है। फिलहाल बैंक अपनी पारदर्शिता के वादे पर कायम है और अब बाजार की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि नियामक संस्थाएं इस मामले में क्या कदम उठाती हैं।

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