मेरठ | उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी (सपा) इस बार कांग्रेस के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरने जा रही है। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव द्वारा हाल ही में दिए गए बयानों के बाद सूबे का सियासी पारा चढ़ गया है और मेरठ जिले में सीटों के बंटवारे को लेकर मंथन शुरू हो चुका है। रणनीतिकारों का मानना है कि जिले की कुल सात विधानसभा सीटों में से पांच या छह पर समाजवादी पार्टी और एक या दो सीटों पर कांग्रेस अपने उम्मीदवार उतार सकती है। लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने वाली सपा का मुख्य फोकस सीटों की संख्या के बजाय केवल जीत हासिल करने पर है।
विपक्षी गठबंधन के तरकश में होंगे ये जमीनी मुद्दे
इस बार के चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन जनता के बीच कई तीखे और बुनियादी मुद्दों को लेकर जाने की तैयारी में है। मेरठ और आसपास के क्षेत्रों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं को ध्यान में रखकर रोजगार की कमी और पेपर लीक का मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाएगा। इसके अलावा, वेस्ट यूपी की लाइफलाइन माने जाने वाले गन्ना किसानों की समस्याएं, जैसे मिलों द्वारा भुगतान में देरी, महंगे खाद-बीज और छुट्टा पशुओं से फसलों की बर्बादी को बड़ा हथियार बनाया जाएगा। साथ ही, मेरठ के प्रसिद्ध सराफ (ज्वैलरी), कपड़ा उद्योग और बुनकर समाज की समस्याओं सहित बिजली की बढ़ती दरों पर छोटे व्यापारियों की नाराजगी को भुनाने की कोशिश होगी। गठबंधन का पूरा जोर 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ महंगाई के खिलाफ जनता को लामबंद करने पर है।
मेरठ की इन सीटों पर सपा की मजबूत दावेदारी
जिले के राजनीतिक समीकरणों को देखें तो कई सीटों पर समाजवादी पार्टी का पलड़ा भारी माना जा रहा है। 'मेरठ शहर' सीट मुस्लिम और दलित मतदाताओं की बहुलता के कारण सपा की सबसे सुरक्षित सीटों में गिनी जाती है। वहीं, 'सरधना' सीट जो ठाकुर, मुस्लिम और गुर्जर बहुल है, वहां से फिलहाल सपा के ही विधायक हैं। 'किठौर' सीट पर भी मुस्लिम, त्यागी और गुर्जर वोटरों के निर्णायक होने से इसे सपा का गढ़ माना जाता है। 'मेरठ दक्षिण' सीट पर भी पीडीए फॉर्मूले को आजमाने के लिए सपा अपनी दावेदारी मजबूत कर रही है। इसके अतिरिक्त, 'सिवालखास' सीट जो जाट-मुस्लिम और किसान राजनीति का केंद्र है, वहां राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के पाला बदलने के बाद सपा किसी बड़े किसान चेहरे को मैदान में उतारने की रणनीति बना रही है।
कैंट और हस्तिनापुर सीटों पर टिकी हैं सबकी नजरें
मेरठ की कुछ सीटें ऐसी हैं जहां मुकाबला बेहद दिलचस्प और अलग समीकरणों वाला होने की उम्मीद है। 'मेरठ कैंट' विधानसभा क्षेत्र पारंपरिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का अभेद्य किला रहा है, जहां वैश्य, पंजाबी, ब्राह्मण और मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा मतदाताओं का दबदबा है। इस सीट पर कांग्रेस अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर सकती है। दूसरी तरफ, अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित 'हस्तिनापुर' सीट का अपना एक ऐतिहासिक मिथक है। राजनीतिक हलकों में यह माना जाता है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता की चाबी इसी सीट से होकर गुजरती है, यानी जिस दल का प्रत्याशी हस्तिनापुर से जीत दर्ज करता है, सूबे में सरकार भी उसी की बनती है। ऐसे में इस सीट पर दोनों ही खेमे फूँक-फूँक कर कदम रख रहे हैं।


